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जैसे जैसे गुजरात चुनावों के दिन करीब आ रहे हैं, एक के बाद एक जाति आधारित संगठनों के नेता कांग्रेस को खुल कर या फिर इशारों में समर्थन देने का ऐलान करने लगे हैं. ऐसे में बीजेपी को याद आने लगी है कांग्रेस के दिग्गज माधव सिंह सोलंकी के तीन दशक पुराने खाम फॉर्मूले की. बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस गुजरात में जातिवाद के जहर को फिर से फैला कर अपनी जीत के सपने देखने लगी है.ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर तो कांग्रेस में शामिल हो गए, दलित नेता जिग्नेश मवानी दिल्ली आ कर भी राहुल गांधी से मिलने से बचे. वहीं, हार्दिक पटेल आरक्षण को लेकर कांग्रेस के साथ तोल मोल में लगे हैं. लेकिन संदेश साफ है कि बीजेपी के गढ़ को भेदने के लिए कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर, पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और दलित नेता जिग्नेश मवानी ऐसी जातियों से आते हैं, जिसमें आरक्षण को लेकर आपस में ही खासी प्रतिस्पर्धा है. इसलिए जमीन पर इन जातियों का साथ आना मुश्किल ही साबित होगा. गुजरात की राजनीति में ठोकोर और पाटीदार जातियां आरक्षण को लेकर एक दूसरे के विरोध में भी खड़ी नजर आतीं हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने भी आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक सीमित कर दी है. ऐसे में गुजरात की 50 फीसदी पटेल और ओबीसी आबादी का आरक्षण के नाम पर एक दूसरे के साथ आना संभव नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में कांग्रेस के साथ उनकी जोड़ तोड़ किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है.गुजरात में 40 फीसदी आबादी ओबीसी की है. ये आबादी कम से कम 70 सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. 2012 के विधासभा चुनावों में कांग्रेस ने उत्तरी गुजरात में 17 और बीजेपी ने 15 सीटें जीतीं थीं. कांग्रेस को उम्मीद है कि अल्पेश ठाकोर के आने से उन्हें इस इलाके में हर सीट पर फायदा मिलेगा. लेकिन, बीजेपी भी हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है.
उत्तरी गुजरात में कांग्रेस की इस जीत का कारण शंकर सिंह वाघेला भी थे, जो अब कांग्रेस से अलग अपनी जन विकल्प पार्टी बनाकर सभी 182 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. इससे मदद किसे मिलेगी ये जग जाहिर है. बीजेपी सूत्रों का मानना है कि 182 में से कम से कम 35 सीटों पर तो वाघेला कांग्रेस के वोट शेयर में सेंघ लगा ही सकते हैं, क्योंकि उन्हें जाति के साथ-साथ एंटी इकंबेंसी वोट भी मिलेंगे.
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि गुजरात में यूपी और बिहार की तरह जातियों की वोटिंग के तय मापदंड नहीं हैं, क्योंकि वोटर अपने व्यावसायिक फायदे के आधार पर वोट देता रहा है. दलितों और मुसलमान मतदाताओं को छोड़ दें, तो कांग्रेस को मिले 30-35 फीसदी वोटों का कोई फिक्सड वोटिंग पैटर्न नहीं रहा है. बीजेपी के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि उनकी सरकार और पार्टी ने हरिजनों और आदिवासियों के लिए जम कर कल्याणकारी काम किए हैं. इसलिए ये जातियां कांग्रेस को वोट देने से पहले दो बार जरूर सोचेंगी.
खास बात ये कि राज्य में दलित आबादी 7 फीसदी और आदिवासियों की आबादी लगभग 15 फीसदी है, जो कई सीटों पर उम्मीदवारों को जीताने का दम भी रखती है. एक आंकड़े के मुताबिक, दलित 13 सीटों पर और आदिवासी 26 सीटों पर हार-जीत तय कर सकते हैं.
बीजेपी जानती हैं कि मुस्लिम मतदाता अब तक उन्हें वोट देने से बचता रहा है, लेकिन यहां भी बीजेपी को बदलाव की लहर नजर आने लगी है. सूत्र बताते हैं कि मुस्लिम नेता, युवा और उनका शिक्षित तबका अब बीजेपी की तरफ झुकने लगा है. कई विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.
अब बात पाटीदारों की. गुजरात का सबसे शक्तिशाली तबका जो कम से कम 48 सीटों पर पाटीदार किसी भी पार्टी को जीत दिला सकते हैं. डाभोई, आणंद, पटेलाद, पाटण जैसी कम से कम 10 विधानसभा सीटें ऐसी हैं कि पाटीदार अपना उम्मीदवार जीता लें. कांग्रेस के माधव सिंह सोलंकी के ‘खाम फॉर्मुले’ की जबरदस्त सफलता के बाद तो कांग्रेस ने पाटीदार नेताओं को टिकट देना भी कम कर दिया था.
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2102 के विधानसभा चुनावों में भी केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी (जो एक पाटीदारों की पार्टी ही थी) को 3.7 फीसदी वोट मिले. सिर्फ 2 विधानसभा सीटों पर जीत मिली. ये बात और है कि इन चुनावों में कड़वा और लेउवा पटेलों के बीच की खाई और गहरी हो गई थी, लेकिन कांग्रेस को कई सीटों पर झटका जरूर दे दिया था.
बीजेपी सूत्रों का मानना है कि अब हार्दिक पटेल कांग्रेस के साथ आए, तो बाकी जातियां छिटक सकती हैं और अगर-अलग लड़ते हैं तो केशुभाई पटेल की तरह कांग्रेस को वोट बैंक को झकझोर देंगे. सोचने वाली बात ये भी है कि आंदोलन के फेर में तमाम पाटीदार कहीं एकजुट तो नहीं हो गए.
अब बात गुजरात के शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच बढ़ी खाई की. बीजेपी अब तक शहरी विधानसभा सीटों पर स्वीप करती आई है. कांग्रेस ने 2012 में 61 ग्रामीण विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके ठीक बाद 2015 में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में बीजेपी ने शहरी क्षेत्रों में स्वीप किया था. कांग्रेस की ग्रामीण इलाकों पर पकड़ बरकरार रही थी. उन्होंने 31 में से 21 जिला परिषद और 230 में से 110 तालुका पंचायतों में जीत हासिल की थी.
गुजरात में बीजेपी 1995 से लगातार चुनाव जीतती आई हैं. इसे संघ की प्रयोगशाला भी माना जाता रहा है, जहां हिंदुत्व का फॉर्मुला सफलता के झंडे गाडता आया है. सालों की एंटी इनकंबेंसी, जीएसटी और नोटबंदी के असर को कुंद करने लिए एक फिर पीएम मोदी ने ही मोर्चा संभाला है. अगले एक महीने में तय है मोदी गुजरात का हर इलाका छान मारेंगे, ताकि मोदी की इस प्रयोगशाला में बीजेपी का प्रभुत्व बरकरार रहे.
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