Tuesday, 2 January 2018

क्‍या है भीमा-कोरेगांव लड़ाई, दलितों के लिए क्‍यों है इसका महत्‍व


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पुणे से सोमवार को शुरू हुए हिंसक प्रदर्शन ने मंगलवार को महाराष्‍ट्र और राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों को भी अपनी जद में ले लिया. हिंसा इस बात को लेकर छिड़ गई कि क्‍या 1818 में भीम-कोरेगांव की लड़ाई जो ब्रिटिश ईस्‍ट इंडिया कंपनी और मराठा संघ के पेशवा शासकों के बीच हुई थी, उसे मनाया जाना चाहिए या नहीं.1800 ईस्‍वी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठों के राज्यों और पेशवा पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया था. पुणे पर अधिकार जमाने के बाद अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को सातारा में शरण लेने को मजबूर कर दिया.


1818 में एक बार फिर पेशवा शासकों ने लड़ी लड़ाई
1818 में पेशवा शासकों ने पुणे शहर को एक बार फिर अंग्रेजों के कब्‍जे से आजाद कराने का फैसला किया. इस लड़ाई में 20 हजार घुड़सवार और 8 हजार पैदल सैनिकों के साथ ज्‍यादातर मराठाओं को शामिल किया गया था. अंग्रेजों ने भीमा-कोरेगांव नामक एक छोटे से गांव में शरण ली थी. इसी समय पेशवा शासकों ने अपनी 2000 सैनिकों की एक टुकड़ी को ब्रिटिश सेना पर हमला करने का आदेश दिया.ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों में ज्यादातर दलित थे
1 जनवरी, 1818 को, ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों में ज्यादातर दलित शामिल थे, जिन्होंने मराठा आक्रमण का सामना किया था. सैनिकों ने रात के दौरान लड़ाई लड़ी और मराठाओें से कोरेगांव गांव की रक्षा करने में कामयाब रहे. एक अनुमान के मुताबिक, उस रात ईस्‍ट इंडिया कंपनी के 200 से 300 सैनिक मारे गए लेकिन पेशवा को भारी नुकसान हुआ क्योंकि लड़ाई में 500 से 600 सैनिक मारे गए थे. मराठाओं की इतनी बड़ी सेना के होते हुए भी उन्‍हें हार का सामना करना पड़ा और पीछे हटने के मजबूर होना पड़ा.


दलित इस दिन को गौरव दिवस के रूप में मनाते हैं
1818 में कोरेगांव में मराठों पर कंपनी की विजय को याद करते हुए दलित इसे गौरव दिवस के रूप में मनाते हैं.  कई दलित कार्यकर्ता इस जीत को ऊपरी जाति पेशवाओं के खिलाफ निचली जाति की जीत के रूप में देखते हैं.


(उदय सिंह राणा)


Article source: https://hindi.news18.com/videos/nation-aar-paar-todays-debate-topic-is-2g-scam-at-news18-india-video-1205915.html

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