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यह ऐसे छात्रों के लिए एक बड़ी राहत है जो बीमारी के चलते परीक्षा नहीं दे पाते और इसको लेकर डरते रहते हैं कि परीक्षा में बैठने का उनका दूसरा प्रयास उन्हें गोल्डमेडल से वंचित कर सकता है.दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी छात्र का प्रथम वर्ष में बीमारी या अन्य किसी परिस्थिति के चलते दूसरे शैक्षणिक वर्ष में परीक्षा देने को पहला प्रयास माना जाएगा. यह छात्र को किसी पहचान से इनकार करने का कोई आधार नहीं है.
न्यायमूर्ति इंदरमीत कौर ने कहा कि विश्वविद्यालय किसी छात्र को अपने बैच में सबसे अधिक अंक लाने के लिए पुरस्कार से इस आधार पर वंचित नहीं कर सकता कि उसने दो पेपर की परीक्षा अगले साल दी.
याचिकाकर्ता ने अपने वकील अमित जॉर्ज के माध्यम से हाईकोर्ट को सूचित किया कि उसने 2010 में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एमिटी लॉ स्कूल के पांच वर्षीय बीए एलएलबी पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था.उसने बताया कि छठे सेमेस्टर की परीक्षा के पांच पेपर में से वह दो पेपर की परीक्षा नहीं दे पाया. इन दो पेपर की परीक्षा मई 2013 में निर्धारित थी. याचिकाकर्ता परीक्षा में नहीं बैठ पाया क्योंकि वह चेचक से पीड़ित था. उसने अपने दो पेपर की परीक्षा 2014 में दी और अच्छे अंक प्राप्त किये.
उसने विश्वविद्यालय से उच्चतम अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण की. फरवरी 2016 में याचिकाकर्ता को यह जानकर हैरानी हुई कि गोल्ड मेडल के लिए उसके नाम पर विचार नहीं किया गया जबकि उसने सबसे अधिक अंक हासिल किये थे. अदालत ने प्रतिवादी विश्वविद्यालय को याचिकाकर्ता को गोल्डमेडल प्रदान करने का निर्देश दिया.
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