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नए साल की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पाकिस्तान के खिलाफ लिए गए बड़े कदम से हुई. ट्रंप ने आंतकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग नहीं करने पर पाकिस्तान को दी जाने वाली 25.5 करोड़ डॉलर यानी 1624 करोड़ रुपये से ज्यादा की सैन्य मदद पर रोक लगा दी है. भारत में अमेरिका के इस फैसले की काफी तारीफ हो रही है.राजनीतिक जानकार और शिक्षाविद् अमेरिका के इस कड़े फैसले को पीएम मोदी की कूटनीतिक संबंधों और ट्रंप के साथ उनकी दोस्ती का नतीजा बता रहे हैं. लेकिन, ऐसे चार कारण हैं, जो ये साबित करते हैं कि ट्रंप की करनी और कथनी में कितना अंतर हैं.
हक्कानी और लश्कर या जैश में फर्क
अपने ताजा ट्वीट में डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि उनकी चिंता सिर्फ हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को लेकर है, जो अफगानिस्तान में एक्टिव हैं और अमेरिकी सैनिकों को टारगेट कर रहे हैं. अक्टूबर में अमेरिकी कांग्रेस ने नेशनल डिफेंस अथॉराइजेशन बिल में भी हक्कानी और लश्कर ए तैयबा को एक नहीं माना है. अमेरिका के लिए हक्कानी अहम है. जबकि, हाफिज सईद और मसूद अजहर का नंबर बाद में है.चीन के प्रति अमेरिका का रवैया
चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर के लिए चीन पहले से ही 50 बिलियन डॉलर का निवेश कर रहा है. अमेरिका ने पाकिस्तान के लिए 255 मिलियन डॉलर की राशि रोकी है. यह चीन के निवेश की तुलना में काफी छोटा हिस्सा है. अमेरिका के पीछे हटने से चीन पाकिस्तान के लिए निवेश की राशि बढ़ाने से भी नहीं हिचकेगा. चीन तालिबान के साथ सिक्स पार्टी डायलॉग प्रोसेस का हिस्सा भी है. चीन ईरान के तेल और गैस का सबसे बड़ा आयातक देश भी है. ऐसे में अमेरिका भले ही पाकिस्तान दो दी जाने वाली मदद रोक दे, लेकिन चीन की तरफ से पाकिस्तान को मदद मिल ही रही है. जिसका नुकसान भारत को हो सकता है.
साल दर साल कम हुई है मदद की राशि
9/11 हमले के बाद जॉर्ज बुश और परवेज मुशर्रफ के समय में अमेरिका हर साल पाकिस्तान को 2 बिलियन डॉलर की मदद देता था. लेकिन ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद, पाकिस्तान को अमेरिका की तरफ से मिलने वाली आर्थिक मदद की राशि कम हुई है. वास्तव में देखा जाए तो अभी पाकिस्तान की हालत उतनी खराब नहीं है, जितनी युद्ध के दौरान थी. ऐसे में अगर अमेरिका अपनी मदद रोक भी देता है, तो भी पाकिस्तान को कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला. क्योंकि चीन से उसे बैकअप मिल रहा है.
ट्रंप के काम से ज्यादा उनके बातों की चर्चा
डोनाल्ड ट्रंप अपने काम से ज्यादा काम की बातों के लिए जाने जाते हैं. वह आतंकी समूहों को खत्म करने के लिए पाकिस्तान के सहयोग नहीं करने पर कड़े कदम उठाने की बात तो करते हैं. लेकिन, कड़े कदम वास्तव में उठाते नहीं हैं. ट्रंप के साथ यह समस्या है कि उनकी नीतियां सिर्फ ट्वीट में रहती हैं. ऐसी नीतिया स्थायी नहीं होती.
पाकिस्तान के ‘झूठ’ और ‘धोखे’ पर भड़के ट्रंप
बता दें कि अमेरिकी प्रशासन का यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस ट्वीट के बाद सामने आया है, जिसमें आरोप लगाया था कि पाकिस्तान ने बीते 15 वर्षों में 33 अरब डॉलर की मदद के बदले अमेरिका को ‘झूठ और धोखे’ के सिवा कुछ भी नहीं दिया है. ट्रंप ने साथ ही यह भी कहा कि पाकिस्तान ने आतंकवादियों को ‘सुरक्षित पनाहगाह’ मुहैया कराई.
पाक सेना बोली-‘अपशब्द और अविश्वास’ के सिवा कुछ नहीं मिला
ट्रंप के बयान के कुछ घंटों बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि उसे आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के युद्ध के समर्थन में उसके सभी कदमों के बदले ‘अपशब्द और अविश्वास’ के सिवाए कुछ नहीं मिला. पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने एक ट्वीट कर कहा, ‘पाकिस्तान ने आतंकवाद निरोधी सहयोगी के तौर पर अमेरिका को जमीन और वायु संपर्क, सैन्य अड्डे एवं खुफिया सूचना सहयोग दिया जिससे पिछले 16 वर्षों में अल-कायदा को खत्म करने में उन्हें मदद मिली, लेकिन उन्होंने अपशब्दों और अविश्वास के सिवाए हमें कुछ नहीं दिया. उन्होंने सीमा पार आतंकवादियों की पनाहगाहों की अनदेखी की जिन्होंने पाकिस्तानियों की हत्या की.’
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