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देशभर की जेलों में सीमा से ज्यादा कैदी कैद किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी कैदी को जेल में भेजा जाता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि उसके कोई मानवाधिकार नहीं है. कैदियों को जानवरों की तरह जेल में डालने पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा, “कैदियों के भी मानवाधिकार हैं. उन्हें पशुओं की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता.”शीर्ष अदालत ने कहा कि जेल में ऐसे कई कैदी हैं, जिन्हें जमानत मिल गई है. लेकिन, जमानत की रकम नहीं भरने की वजह से उन्हें रिहा नहीं किया गया है. वहीं, कुछ लोग मामूली क्राइम के लिए जेल में हैं, जिन्हें काफी समय पहले जमानत मिल जानी चाहिए थी.
जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच पीठ ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जेलों में काफी भीड़ है. कैदियों के भी मानवाधिकार हैं. उन्हें पशुओं की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता.’’
बेंच ने कहा, ‘‘जेल सुधारों के बारे में बात करने का क्या मतलब है, जब हम उन्हें जेल में नहीं रख सकते. अगर आप उन्हें सही से नहीं रख सकते हैं, तो हमें उन्हें रिहा कर देना चाहिए.’’कोर्ट ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब बेंच को सूचित किया गया कि देश के कई जेलों में निर्धारित संख्या से छह गुना ज्यादा लोग रखे गए हैं. बेंच ने विधिक सेवा प्राधिकरण के वकीलों की भी आलोचना की, जिन्होंने कैदियों की रिहाई सुनिश्चित नहीं की. बेंच ने कहा कि शीर्ष अदालत 30-40 साल पहले कह चुकी है कि कैदियों के भी मानवाधिकार हैं.
बता दें कि शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) से 21 फरवरी को कहा था कि वह जेलों में काफी भीड़ के मुद्दे की पड़ताल करे; और उसके सामने जेलों में आबादी के बारे में संख्या रखे. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट देशभर के 1382 जेलों में व्याप्त अमानवीय स्थिति के संबंध में याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
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हमारे पास डेटा चोरी को लेकर कोई कानून नहीं’- सुप्रीम कोर्ट
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