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(ऋषिका सदाम)कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के साथ मंच साझा किया. चार पार्टियों के गठबंधन के बाद यह पहली बार था जब कांग्रेस अध्यक्ष टीडीपी प्रमुख के साथ नजर आए. इस दौरान उन्होंने कहा कि केंद्र में एंटी-बीजेपी गठबंधन की सरकार बनने के बाद आंध्र प्रदेश के विभाजन के वक्त किए गए सभी वायदे पूरे किए जाएंगे.
इस रैली में कांग्रेस और टीडीपी के साथ गठबंधन के अन्य सहयोगी सीपीआई और तेलंगाना जन समिति ने भी हिस्सा लिया. रैली के दौरान राहुल ने कहा, “पहले हम नरेंद्र मोदी की बी टीम (टीआरएस) के खिलाफ लड़ेंगे और इसके बाद हम ए टीम (बीजेपी/एनडीए) को मात देंगे.
महाबुद्धनगर जिले के कोसिगी में एक रैली को संबोधित करते हुए राहुल ने टीआरएस पर बीजेपी का साथ देने का आरोप लगाते हुए कहा, “टीआरएस का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति नहीं है, इसका नाम तेलंगाना राष्ट्रीय संघ परिवार है. मत भूलिए कि टीआरएस संघ परिवार और बीजेपी की बी टीम है.”वहीं आध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि सभी एंटी-बीजेपी पार्टियों के साथ आने और बीजेपी के खिलाफ लड़ने की ‘ऐतिहासिक आवश्यकता’ थी. उन्होंने सरकार पर आरबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जैसी संस्थाओं को नष्ट करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि वह बीजेपी और उसके सहयोगियों के खिलाफ व्यापक आधार बनाने की संभावना का पता लगाने के लिए 10 दिसंबर को सभी गैर-एनडीए दलों की एक बैठक करेंगे.
राज्य में विपक्षी दलों के गठबंधन का प्रमुख कारण केसीआर विरोधी भावना को बढ़ाना है, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ये ‘नई दोस्ती’ तेलंगाना के लोगों का दिल जीतने में कामयाब हो पाएगी? दरअसल पिछले चुनाव में केसीआर को मजबूत तेलंगाना की भावना का लाभ मिला था. साढ़े चार साल सत्ता में रहने का बाद उनके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी जरूर है लेकिन राज्य में आज भी उनका काफी अधिक प्रभाव है.
वहीं बात चंद्रबाबू नायडू की करें तो उनका तेलंगाना के साथ एक दशक पुराना नाता है. पूर्व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर तेलंगाना के गठन का विरोध करने तक, वे सिक्के के दोनों तरफ हैं. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या कांग्रेस का टीडीपी से गठबंधन करने का फैसला सही है? राजनीतिक विश्लेषक इसके बारे में दो राय रखते हैं.
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राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर नागेश्वर राव ने न्यूज18 से कहा, “गठबंधन ने निश्चित तौर पर राज्य में कांग्रेस की स्थिति को मजबूत किया है. यदि यह काम करता है तो राज्य में यह पार्टी के लिए बूस्ट की तरह काम करेगा.” वह कहत ेहैं कि आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों की एक बड़ी आबादी हैदराबाद में रहती है, नायडू या टीडीपी के लिए उनका समर्थन अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के लिए समर्थन होगा.
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राज्य के दूसरे हिस्सों में नायडू की तेलंगाना में वापसी मतदाताओं पर क्या असर डालेगी? एक रैली के दौरान केसीआर ने नायडू और तेलंगाना में बने विपक्षी गठबंधन पर हमला बोलते हुए राज्य के लोगों से कहा कि वे राज्य को फिर ‘आध्र के शासकों’ के हाथ में न जानें दें. राज्य के कार्यवाहक आईटी मंत्री केटी रामा राव ने न्यूज18 से बात करते हुए कहा कि नायडू कांग्रेस के साथ तेलंगाना को चलाने की कोशिश कर रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक नागेश्वर राव आगे कहते हैं, “तो दोस्ती के दो पक्ष हो सकते हैं. नायडू यहां कांग्रेस के लिए संपत्ति और ऋण दोनों साबित हो सकते हैं. लेकिन अभी यह कहना काफी जल्दी होगा कि वह इन दोनों में से क्या साबित होंगे.” तेलंगाना विधानसभा चुनाव महागठबंधन का भी लिटमस टेस्ट हैं. विश्लेषकों का मानना है कि संयुक्त गठबंधन को मिली बड़ी जीत राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत संदेश देगी.
तेलंगाना चुनाव में 10 दिन से भी कम वक्त बाकी है इसलिए राज्य में राजनीतिक गतिविधि तेज हो रही है. मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना में स्थानीय बीजेपी नेताओं के लिए चुनाव प्रचार किया था. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी बुधवार को यहां चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे.
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