Friday, 30 November 2018

OPINION: 'हनुमान' विवाद- ये है योगी आदित्यनाथ और गोरखनाथ मठ के दलित प्रेम की पूरी कहानी!


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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान एक सभा में हनुमान जी को दलित क्या कहा, देश भर में विवाद शुरू हो गया. कहीं ब्राह्मण उनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, तो कहीं दलित संगठन हनुमान मंदिरों पर अपना दावा ठोक रहे हैं. दरअसल, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का दलितों से ‘पुराना रिश्ता’ है! योगी का दलित प्रेम दिल से है या सिर्फ दिखावा? इसकी एक बानगी देखिए. आपको शायद ही इस बात की जानकारी हो कि गोरखनाथ मंदिर के वर्तमान मुख्य पुजारी कमलनाथ भी दलित हैं. योगी के बाद वो मंदिर का सबसे अहम चेहरा हैं.



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आदित्यनाथ ही नहीं उनके गुरु अवैद्यनाथ भी दलितों और वनवासियों का मुखर समर्थक रहे थे. नाथ परंपरा के तहत योगी और उनका मठ लंबे समय से छुआछूत के खिलाफ काम कर रहे हैं. सीएम बनने के बाद उन्होंने दलित के घर खाना खाने का अभियान चलाया और इसमें पार्टी की यूपी विंग को शामिल कराया. सीएम बनने से पहले भी योगी समाज में समरसता के लिए दलितों के बीच जाकर भोजन करते रहे हैं, ताकि हिंदू विभाजित न हो.


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‘अस्पृश्यता हिंदू समाज का अभिशाप है. धर्मशास्त्रों में इसके लिए कोई स्थान नहीं….’ ये लाइनें किसी दलित नेता की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के उस मठ की दी हुई हैं जिसके वो पीठाधीश्वर भी हैं. उनकी कट्टर छवि तले यह बात छिप जाती है.



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गोरखनाथ मंदिर उन मंदिरों की विचारधारा से अलग है, जहां दलितों का प्रवेश वर्जित होता है. इस मंदिर की ओर से जात-पात के खिलाफ लंबे समय से अभियान चलाया जा रहा है. संभव है कि हनुमान जी को आदिवासी और दलित बताने वाला योगी का ये दांव दलितों का वोट लेने के लिए हो. संभव है कि इस कदम का कोई राजनीतिशास्त्र हो.


योगी को बहुत नजदीक से जानने वाले गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही कहते हैं, ‘गोरखनाथ पीठ की परंपरा के अनुसार योगी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया. सहभोज के माध्यम से छुआछूत (अस्पृश्यता) पर प्रहार किया. इसलिए उनके साथ बड़ी संख्‍या में दलित भी जुड़े हुए हैं. गांव-गांव में सहभोज के माध्यम से ‘एक साथ बैठें-एक साथ खाएं’ मंत्र का उन्होंने उद्घोष किया.”



शाही बताते हैं, “गोरखनाथ मठ के मुख्य पुजारी कमलनाथ दलित चेहरा हैं. योगी के बाद सारा कामकाज वही संभालते हैं. आदित्‍यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने दक्षिण भारत के मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर संघर्ष किया. जून 1993 में पटना के महावीर मंदिर में उन्‍होंने दलित संत सूर्यवंशी दास का अभिषेक कर पुजारी नियुक्‍त किया.”


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शाही के मुताबिक “इस पर विवाद भी हुआ लेकिन वे अड़े रहे. यही नहीं इसके बाद बनारस के डोम राजा ने उन्‍हें अपने घर खाने का चैलेंज दिया तो उन्‍होंने उनके घर पर जाकर संतों के साथ खाना भी खाया.”



गोरखनाथ मंदिर का मत है कि “हरिजन भी हिंदू समाज के उसी उसी तरह से अभिन्न अंग हैं जिस तरह क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी अथवा सनातनी लोग हैं. उनके प्रति समाज में उत्पन्न भेदभाव की भावना चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक, राजनीतिक हो अथवा आर्थिक, समाप्त कर दी जानी चाहिए. शास्त्रों में इसके लिए कोई स्थान नहीं है. भूतकाल में इसकी वजह से काफी क्षति उठानी पड़ी है. अब हम इसे भविष्य में कदापि चालू रहने की आज्ञा नहीं दे सकते. यह हिंदू समाज के लिए आत्महत्या समान ही है.”



योगी आदित्यनाथ का वनटांगियों से भी खास लगाव है. सांसद रहते हुए योगी ने सड़क से संसद तक इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी. इन्हें नागरिक अधिकार देने का मामला संसद में उठाया. ज्यादातर वनटांगिया दलित और पिछड़े वर्ग से हैं. योगी 11 साल से उन्हीं के साथ दीपावली मनाते हैं.


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राजनीति में क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं दलित
2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 16.63 फीसदी अनुसूचित जाति और 8.6 फीसदी अनुसूचित जनजाति हैं. 150 से ज्यादा संसदीय सीटों पर एससी/एसटी का प्रभाव माना जाता है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 46,859 गांव ऐसे हैं जहां दलितों की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है. 75,624 गांवों में उनकी आबादी 40 फीसदी से अधिक है. देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा की 84 सीटें एससी के लिए, जबकि 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. विधानसभाओं में 607 सीटें एससी और 554 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. इसलिए सबकी नजर दलित वोट बैंक पर लगी हुई है.



इसी वोटबैंक के भरोसे मायावती चार बार यूपी की सीएम बन चुकी हैं. रामविलास पासवान, उदित राज, रामदास अठावले जैसे दलित नेता उभरे हैं. चंद्रशेखर आजाद और जिग्नेश मेवाणी जैसे नए दलित क्षत्रप भी इसी संख्या की बदौलत पैदा हुए हैं.


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जहां तक राजस्थान की बात है तो यहां करीब 30 फीसदी वोटों के साथ अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय निर्णायक स्थिति में हैं. 1993 के बाद आरएसएस के सहयोगी संगठन वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए बीजेपी ने अनुसूचित जाति-जनजाति आदिवासी इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत की थीं, जिसका फायदा उसे लगातार चुनावों में होता रहा है. हालांकि, इस बार हालात बदले हुए हैं. अनुसूचित जाति जनजाति आरक्षण बचाओ आंदोलन के दौरान वसुंधरा सरकार का रवैया इनके नेताओं के प्रति काफी सख्त रहा.



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Article source: https://www.jagran.com/haryana/panipat-18243350.html

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