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(सुजीत नाथ) सेंटिनल द्वीप के आदिवासियों के साथ आखिरी बार 1991 में ‘दोस्ताना संपर्क’ साधा गया था. सेंटिनल द्वीप के आदिवासी किसी भी बाहरी व्यक्ति के साथ कोई संपर्क नहीं रखते हैं और इसका हिंसक तरीके से विरोध करते हैं. सरकार ने इस जनजाति की सुरक्षा के लिए सेंटिनल द्वीप में बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया हुआ है.
4 जनवरी 1991 को उत्तरी सेंटिनल द्वीप की अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए ट्राइबल वेलफेयर के पूर्व डायरेक्टर एसए अवारदी बताते हैं कि ये सेंटिनल द्वीप में रहने वालों के साथ संपर्क स्थापित करने का एक आधिकारिक अभियान था. अवारदी वर्तमान में अंडमान एवं निकोबार ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पोर्ट ब्लेयर के डायरेक्टर हैं. वे उस वक्त एक प्रशासनिक जहाज पर 13 सदस्यीय टीम का नेतृत्व कर रहे थे.
अभियान की शुरुआत 3 जनवरी 1991 को पोर्ट ब्लेयर से हुई. समुद्र में 60 किलोमीटर की यात्रा के बाद टीम अगले दिन सेंटिनल द्वीप पहुंची. ट्राइबल वेलफेयर द्वारा मिशन का आयोजन सेंटिनल द्वीप पर रहने वाले आदिवासियों के स्वास्थ्य और उनके व्यवहार के तरीके जानने के लिए किया गया था. न्यूज18 से बात करते हुए अवारदी ने कहा कि वह यात्रा के दौरान वह डरे हुए लेकिन रोमांचित थे.उन्होंने कहा, “मैं आम तौर पर लोगों के बीच अपने इस तरह के अनुभवों की चर्चा नहीं करता हूं. लेकिन क्योंकि सेंटिनल द्वीप चर्चा में हैं, इसलिए मैंने इस द्वीप पर रहने वाले लोगों के साथ पहले ‘दोस्ताना संपर्क’ के अनुभव को साझा करने पर विचार किया.”
उन्होंने कहा, “इस पूरी यात्रा के दौरान मेरे अंदर तरह-तरह की भावनाएं रहीं. मैं डरा हुआ था, मैं रोमांचित था और मैं उत्साहित था.” उन्होंने कहा कि मेरी टीम इस बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ थी कि सेंटिनल वासी कैसा व्यवहा करेंगे. मुझे कुछ नहीं पता था कि अगर हम उनसे संपर्क साधेंगे तो वो क्या करेंगे. वो हम पर हमला करेंगे या फिर हमारा स्वागत करेंगे. मेरे दिमाग में हर वक्त यहीं बात चल रही थी.”
4 जनवरी 1991 की सुबह 4:30 बजे अवारदी ने मुख्य जहाज से उतरकर एक छोटे जहाज के सहारे सेंटिनल द्वीप जाने का फैसला किया. उस दिन को याद करते हुए अवारदी कहते हैं, “कुछ मिनटों के बाद मैंने देखा कि सेंटिनल जनजाति के कुछ लोग जंगल से बाहर आ रहे हैं. वे संख्या में 27 थे. मैं रोमांच से भर गया लेकिन मुझे डर भी लग रहा था.”
उन्होंने आगे बताया कि उनमें से कुछ लोग उनके पास आ गए, लेकिन उनमें से किसी के पास भी धनुष और बाण नहीं थे. अवारदी ने कहा, “ये आश्चर्यजनक था. हमने उन्हें नारियल देना चाहा और उन्होंने इसे ले लिया. ऐसा लगा मानो वे हमारा स्वागत कर रहे हों.”
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टीम करीब 30 मिनट किनारे पर रुकी रही और इसके बाद पोर्ट ब्लेयर लौट आई. अवारदी कहते हैं, “यह यादगार यात्रा थी. मुझे आज समझ नहीं आया कि वे लोग बिना धनुष-बाण के मेरे पास क्यों आए. उन्होंने अपनी भाषा में कुछ कहा. काश कि मैं समझ बाता कि उन्होंने मेरे बारे में क्या कहा.”
यात्रा की तैयारियों पर बात करते हुए अवारदी ने कहा कि उन्होंने जारवा जनजाति पर किताब पढ़ी थी, क्योंकि एक वक्त पर ये भी ऐसा ही व्यवहार करते थे.
सेंटिनल द्वीप पर रहने वाले लोगों के साथ अवारदी के इस सफल दोस्ताना संपर्क के एक महीन बाद त्रिलोकनाथ पंडित के नेतृत्व में एक और अभियान वहां गया. यह अभियान फरवरी 1991 में भेजा गया था. त्रिलोकनाथ पंडित से जब अमेरिकी टूरिस्ट एलेन चाऊ की हत्या के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि आदिवासियों को अकेला छोड़ देना चाहिए.
आपको बता दें कि 1991 से पहले भी 60, 70 और 80 के दशक के दौरान भी सेंटिनल द्वीप वासियों के साथ संपर्क साधने की कोशिश की गई थी लेकिन किसी भी अभियान में द्वीप वासियों के साथ ‘दोस्ताना संपर्क’ नहीं साधा जा सका था.
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