Thursday, 29 November 2018

OPINION | तेलंगाना में अल्पसंख्यक बिगाड़ सकते हैं केसीआर का गणित


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बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तीखी आलोचना से अब तक बचते रहे तेलंगाना के केयरटेकर मुख्यमंत्री और टीआरएस पार्टी के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव अब पूरी ताकत के साथ बीजेपी को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. बीजेपी- टीआरएस के सीक्रेट गठजोड़ की कहानी ने केसीआर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और उन्हें मुस्लिम वोट बैंक खिसकता नजर आ रहा है, जिसपर वो भरोसा किए बैठे थे.केसीआर के खिलाफ तेलंगाना में राहुल गांधी जहां भी जा रहे हैं, वहां यह बात प्रमुखता से उठा रहे हैं कि टीआरएस और बीजेपी के बीच गुपचुप समझौता है और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के बाद केसीआर, नरेंद्र मोदी के साथ खड़े नजर आएंगे. राहुल गांधी पिछले साढ़े चार साल में टीआरएस की संसद में भूमिका का हवाला दे रहे हैं. टीआरएस ने नरेंद्र मोदी सरकार के नोटबंदी का समर्थन किया था, तीन तलाक और केंद्र सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में लोकसभा की कार्यवाही का बहिष्कार करके परोक्ष रूप से बीजेपी की मदद की थी.


राहुल गांधी की यह बातें मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं और अल्पसंख्यक समाज बंटा हुआ नजर आ रहा है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने टीआरएस के खिलाफ वोट करने की लोगों से अपील की है. उनके नेता हाफिज पीर शब्बीर का कहना है कि ‘धर्मनिरपेक्षता उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बर्बाद करने वाले लोगों का साथ देने वाली पार्टी का साथ किसी हालत में नहीं दिया जा सकता’.


डेमैज कंट्रोल के लिए केसीआर ने AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी का सहारा लिया है. असदुद्दीन ओवैसी उन जगहों पर भी जनसभा कर रहे हैं, जहां उनका उम्मीदवार मैदान में ही नहीं है. ओवैसी टीआरएस के पक्ष में वोट मांग रहे हैं, लेकिन ओवैसी की इन सभाओं का असर भी उलटा पड़ने का खतरा टीआरएस को नजर आने लगा है. असदुद्दीन ओवैसी पर पहले से आरोप है कि वो अपने भड़काऊ भाषणों से बीजेपी की मदद करते हैं और हिंदू वोट को बीजेपी के लिए एकजुट करने में सहायता करते हैं.तेलंगाना में ओवैसी की पार्टी सिर्फ हैदराबाद तक सीमित है और शहर की सिर्फ 8 विधानसभा सीटों पर किस्मत आजमा रही है. खास बात यह है कि ओवैसी खुद हैदराबाद छोड़कर टीआरएस के प्रचार के लिए दूसरे शहरों में जाने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं. हैदराबाद की याकूतपुरा, नामपल्ली और राजेंद्रनगर विधानसभा सीट पर ओवैसी के उम्मीदवारों को कांटे की टक्कर मिल रही है. ओवैसी की पार्टी के नेताओं पर वक्फ बोर्ड की जमीनों पर कब्जे के आरोप हैं और हैदराबाद के पुराने शहर में एक बड़ा मुस्लिम तबका उनसे इस बात को लेकर नाराज है.


मुस्लिम वोटरों की नाराजगी को भांपते हुए असदुद्दीन ओवैसी को याकूतपुरा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बदलने पर मजबूर होना पड़ा. याकूतपुरा से विधायक रहे मुमताज अहमद खान को हटाकर चारमीनार सीट से चुनाव लड़ाया जा रहा है और चारमीनार सीट से विधायक मोहम्मद पाशा कादरी को याकूतपुरा से टिकट दिया गया है.


असद्दुदीन ओवैसी पुराने हैदराबाद शहर में रोजाना पदयात्रा कर रहे हैं और एक-एक दरवाजा खटखटाकर लोगों से वोट मांग रहे हैं. राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर मंजूर आलम शेख मानते हैं कि ‘अगर ओवैसी हैदराबाद में एक भी विधानसभा सीट पर चुनाव हारते हैं, तो इससे उनकी छवि पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा और देश के सबसे बड़े मुस्लिम नेता बनने का उनका सपना चकनाचूर हो सकता है’. लिहाजा ओवैसी भी केसीआर की ज्यादा मदद कर पाने की हालत में नहीं हैं.तेलंगाना में अल्पसंख्यक समुदाय के 14.5 प्रतिशत वोट हैं. इसमें 13.5 प्रतिशत मुस्लिम और एक प्रतिशत बाकी अल्पसंख्यक समाज के वोट हैं. धर्मपरिवर्तन करने वाले दलित समाज के लोगों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो अल्पसंख्यक समाज के वोट 17 फीसदी तक पहुंच जाते हैं. धर्म परिवर्तन करने वालों में ज्यादा लोगों ने ईसाई धर्म को अपनाया है.


माना जाता है कि यह लोग जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस को पसंद करते हैं और तेलंगाना चुनाव में यह लोग केसीआर के पक्ष में वोट कर सकते हैं. तेलंगाना में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी चुनाव मैदान में नहीं हैं और जगनमोहन रेड्डी के टीआरएस अध्यक्ष के चंद्रशेखर से अच्छे समीकरण बन गए हैं, लेकिन इससे केसीआर को कोई बड़ी राहत मिलती नहीं नजर आ रही. 13.5 फीसदी मुस्लिम वोट अगर केसीआर से नाराज होकर कांग्रेस की अगुवाई वाले ‘महाकुटामी’ गठबंधन की तरफ खिसकता है या फिर यह वोट बंटता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान टीआरएस को हो सकता है.


Article source: http://www.jagran.com/news/national-security-forces-kills-3-terrorist-in-kashmir-16517391.html

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