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(सुमित पांडेय)राजस्थान में शतरंज की बिसात बिछ चुकी है और राजनीतिक चर्चाएं भी जोरों पर हैं. लगातार इस बात की चर्चा है कि क्या बीजेपी फिर से सत्ता पर काबिज़ हो पाएगी या कांग्रेस बाजी पलटने में कामयाब होगी. लेकिन इन सबके बीच कुछ नए समीकरण भी राज्य में उभरने लगे हैं. नागौर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी’ के नाम से एक नई पार्टी बनाई है. जो राज्य में पूरे समीकरण को बदल सकता है.
इस पार्टी की आजकल खूब चर्चा है. इस पार्टी के समर्थक मूल रूप से जाट समुदाय के लोग और खासकर युवा जाट हैं. बेनीवाल ने राज्य की कुल 200 विधानसभा सीटों में से करीब 60 पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. उन्होंने छोटी पार्टियों को भी साथ में लिया है.
ये भी पढ़ें- BJP ने 52 पेज के घोषणा पत्र में राजस्थान से किए 20 बड़े वादेजाटों की अधिकता वाले ‘लक्ष्मण का बास’ क्षेत्र में गांव के ही एक आदमी ने कहा कि हम बहुत सी पार्टियों को वोट दे चुके हैं लेकिन इस बार हमें इस पार्टी को वोट देना चाहिए. सीकर विधान सभा सीट पर वहीद चौहान बेनीवाल की पार्टी से उम्मीदवार हैं. पिछली बार 2013 में उन्होंने एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था उस वक्त उन्हें 40 हज़ार वोट मिले थे.
चौहान ने कहा कि मुझे कांग्रेस से टिकट चाहिए था. मैं बीजेपी से नहीं जुड़ सकता. लेकिन आरएलपी से चुनाव लड़ने पर जाट समुदाय का वोट मुझे मिल सकता है और मै जीत सकता हूं.
राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में तीन जिले चुरू, सीकर और झुंझनू आते हैं. पारंपरिक रूप से यह कांग्रेस का गढ़ रहा है. इस क्षेत्र में 21 सीटें हैं. इस क्षेत्र में जाट, मुस्लिम और एससी मुख्य रूप से किसी भी उम्मीदवार के भाग्य का फैसला करते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी लहर थी तब भी इस क्षेत्र में बीजेपी को 21 सीटों में से सिर्फ 11 सीटें ही मिली. थीं जबकि बाकी के क्षेत्रों में बीजेपी की जीत का प्रतिशत 80 था.
90 के दशक में बीजेपी और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने जाटों को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा देख लिया था. इसलिए पार्टी ने इस समुदाय में भी अपना आधार बढ़ाना शुरू किया और 2003 में इसी की वजह वसुंधरा राजे पूरे बहुमत से मुख्यमंत्री बनीं.
दूसरे कार्यकाल में, शेखावटी क्षेत्र किसानों के आंदोलन का अड्डा बन गया. किसानों द्वारा ऋण माफी और बेहतर एमएसपी को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई में आंदोलन किया गया. जाटों को इसका समर्थन था.
जहां आरएलपी एक तरफ जाट समुदाय के लोगों को लुभाने में लगी हुई है वहीं कांग्रेस ने बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक राजपूतों को रिझाने की कोशिश शुरू कर दी है. इन दोनों समुदाय के लोग जहां कहीं भी ठीक-ठाक संख्या में हैं वहां इनके बीच एक मतभेद की स्थिति है.
इसलिए इस हफ्ते की शुरूआत में कांग्रेस के उम्मीदवार ने आरएलपी के वहीद चौहान के खिलाफ आनंद पाल के परिवार को अपने पक्ष में प्रचार करने के लिए बुलाया था. नागौर जिले के हिस्ट्री शीटर पाल की मौत पिछले साल पुलिस इनकाउंटर में हो गई थी. इस बात को लेकर राजपूत समुदाय के लोगों ने काफी विरोध भी किया था.
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इसको लेकर विरोध की आग अभी भी सुलग रही है. राजपूत आज़ादी के बाद से ही गैर-कांग्रेसी पार्टियों को ही वोट देते रहे हैं. अगर ये वोट कांग्रेस के खाते में गया तो बीजेपी को बड़ा नुकसान हो सकता है.
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हालांकि बीजेपी समर्थकों का मानना है कि पार्टी को ज़्यादा नुकसान नहीं होगा. सीकर-जयपुर रोड पर दिनेश पारिख का एक टी स्टॉल है. वो बीजेपी के कट्टर समर्थक हैं उन्होंने बीजेपी के अलावा आज तक किसी दूसरी पार्टी को वोट नहीं किया. उन्होंने कहा कि कोई भी उम्मीदवार हो पर वो बीजेपी को छोड़कर किसी को भी वोट नहीं करेंगे.
उनके पास इसकी पूरी गणित है. वो बताते हैं कि जाट कहां वोट करेंगे. राजपूत उस पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे. क्या ब्राह्मण इस क्षेत्र में फिर से एक साथ आएंगे क्योंकि कांग्रेस ने उसी समुदाय के व्यक्ति को वोट दिया है. हालांकि उन्होंने इस पर कुछ नहीं कहा कि राजस्थान में फिर से किसकी सरकार बनेगी.
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