Tuesday, 27 November 2018

जानिए, उस शख़्स के बारे में जो RSS को मुस्लिमों से जोड़ता है


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने मंगलवार को अयोध्या मुद्दे पर देरी के चलते सुप्रीम कोर्ट के संबंधित जजों को जमकर लताड़ा. इससे पहले भी वे इस मुद्दे पर बेबाकी से बोल चुके हैं कि जब काबा, हरमिंदर साहब और वेटिकन को नहीं बदला जा सकता तो राम मंदिर की जगह पर इतना विवाद क्यों! इंद्रेश का चरित्र और जीवन इतिहास अपने बोलों जितना ही दिलचस्प है. वे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नामक राष्ट्रवादी संगठन के मार्गदर्शक हैं, ये वह संगठन है जो घोर हिंदूवादी माने जाने वाले आरएसएस से मुस्लिमों को जोड़ता है. बता दें कि ये वही संगठन है जिसने कई मुद्दों पर आरएसएस का समर्थन किया है, गौ-वध का विरोध भी इनमें से एक है. आखिर कौन हैं इंद्रेश कुमार, जो संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने के साथ भी एक मुस्लिम संगठन के मार्गदर्शक बने हुए हैं.जब अयोध्या में राममंदिर बनाने को कांग्रेस लाई थी अध्यादेश और बीजेपी ने किया था विरोध


18 फरवरी 1949 में पंजाब के समाना में जन्मे इंद्रेश के जन्म के कुछ दिनों बाद ही परिवार कैथल चला गया. इंद्रेश का शुरुआती रुझान गणित में था और उन्होंने चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री. हालांकि पढ़ाई के दौरान ही युवक इंद्रेश आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होने लगे और 1970 में वे दिल्ली में आरएसएस के प्रचारक के तौर पर पूरी तरह से जुड़ गए. इसके बाद से संघप्रचारक के तौर पर उनका कद लगातार मजबूत होता चला गया, यहां तक कि संघ के लोग दबी जबान ने उन्हें ही संघ का सबसे कद्दावर चरित्र मानते हैं.


मंगल तक जाने का इतना होगा किराया!साल 1975 की जून से लगभग 21 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान इंद्रेश ने भूमिगत आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. गौरतलब है कि भारत की राजनीति का काला इतिहास माने जाने वाले इस दौर में संघ को बड़ा खतरा मानते हुए उसपर प्रतिबंध लगा दिया गया था और हजारों कार्यकर्ताओं को कैद कर लिया गया. इसके विरोध में सत्याग्रह हुआ जिसकी नींव तैयार करने में महज 26 साल के युवक इंद्रेश ने दिग्गजों के साथ-साथ काम किया. तभी से वे एक प्रखर और प्रभावी कार्यकर्ता के रूप में देखे जाने लगे और संघ के कामकाज में उनकी राय मायने रखने लगी.


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संघ के इस चेहरे को कम ही लोग जानते हैं तो इसकी वजह है इंद्रेश की कैमरे से अलग-थलग रहने की आदत. वे घर के ऐसे मुखिया की तरह काम करने पर यकीन रखते हैं जो भीतर ही रहते हुए सारे बड़े कामों को अंजाम दे पाता है. आमतौर पर बेहद शांत और मितभाषी माने जाने वाले इंद्रेश जब बोलते हैं तो धारदार तर्कों के साथ बात करते हैं. अयोध्या मुद्दे पर उनकी राय में कोई घालमेल नहीं और कई मौकों पर वे इस बारे में बोल चुके हैं. कट्टर हिंदूवादी होने के बावजूद इंद्रेश दूसरे धर्मों की विचारधारा का समान सम्मान करते हैं. वे पार्टी के पहले ऐसे हिंदू नेता हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर जाकर चरार-ए-शरीफ पर माथा टेका. कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने के लिए वे लगातार काम कर रहे हैं.


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इंद्रेश की इसी छवि की वजह से उन्हें एक बड़ा काम सौंपा गया- संघ से मुस्लिमों के मेल का. साल 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नामक संगठन बना और इंद्रेश तब से इसके मार्गदर्शक के तौर पर दोनों विचारधाराओं में सौहार्द्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं. 16वें लोकसभा चुनाव में भाजपा को मुस्लिमों के बड़े तबके का समर्थन मिलने के पीछे इंद्रेश की ये पहल भी मानी जाती है. 10 हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवकों के साथ इस संगठन का मानना है कि संघ मुस्लिमों का दुश्मन नहीं. स्वयंसेवकों की इस सोच और प्रेरणा के पीछे इंद्रेश की मृदुभाषिता और स्पष्ट सोच भी एक वजह है.


हालिया प्रकरण में इंद्रेश का जजों पर कटाक्ष भी उनकी इसी चारित्रिक विशेषता की ओर इशारा करता है, जब वे कहते हैं- हर वर्ग को राम मंदिर स्वीकार है और बस आचार संहिता हटने का इंतजार किया जा रहा है.

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