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‘तुम कॉल डिटेल्स चेक करवाओ और तुम ज़रा सीसीटीवी के फुटेज अरेंज करो..’ बेटी के साथ गायब हुई नंदा के घर पूछताछ करने के बाद पुलिस को यह पता चल चुका था कि नंदा अपनी बेटी के साथ मंजू के घर के लिए निकली थी. कॉल डिटेल्स और फुटेज का इंतज़ाम होता, तब तक मंजू से पूछताछ की गई. मंजू ने कहा कि ‘मुझे नहीं पता कि उस दिन नंदा मेरे घर आने वाली थी, आई भी नहीं’. अब सवाल पेचीदा हुआ कि नंदा और छोटी सी बच्ची एंजेल कहां गायब हो गए?’इसका कोई चक्कर-वक्कर तो नहीं था?’ गुजरात के दाहोद में पुलिस की जांच टीम इस केस समझने की कोशिश में थी. ‘सर, वो 48 साल की औरत थी. तीन-चार साल की बच्ची को गोद लिया था उसने. कोई चक्कर होना मुश्किल लगता है.’ अगर ऐसा नहीं था तो बात कहां अटक रही थी? तभी सीसीटीवी फुटेज मिले और उसमें नंदा नन्ही सी एंजेल के साथ मंजू के घर जाती हुई साफ दिखाई दे रही थी.
‘ये मंजू झूठ बोल रही है. इसको आड़े हाथों लेना पड़ेगा.’ नंदा के घर के लोगों ने यह भी बताया था कि बीते 17 नवंबर को नंदा कर्ज़ में दी रकम लेने के लिए मंजू के घर गई थी. पुलिस को समझ में आ रहा था कि मामला पैसों के लेनदेन का था इसलिए नंदा और एंजेल के गायब होने के बारे में मंजू को ज़रूर कुछ पता था लेकिन वह छुपा रही थी. मंजू और उसके पति दिलीप से लगातार पूछताछ की जा रही थी और दोनों किसी जानकारी से इनकार कर रहे थे.
फिर कॉल डिटेल्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नंदा और मंजू के बीच उस दिन बातचीत हुई थी और उसके बाद ही वह मंजू के घर के लिए निकली थी. अब मंजू का झूठ पूरी तरह पकड़ा जा चुका था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर पूछताछ करना शुरू की लेकिन मंजू और दिलीप अब भी कुछ बताने से बच रहे थे. ‘नंदा और उसकी बच्ची कहां है? हमें नहीं पता सर. वो घर आने वाली थी लेकिन आई नहीं थी.’
पुलिस के पास शक करने की वजह थी लेकिन कोई ऐसा सबूत नहीं मिला था जिससे दोनों को मजबूर किया जा सके. जुर्म भाग तो सकता है, लेकिन छुप नहीं सकता इसलिए 23 नवंबर को दाहोद पुलिस के पास खबर आई. ‘सर, लिमखेड़ा के पास हदफ नदी से एक लाश मिली है.’ पुलिस ने फौरन उस लाश की शिनाख्त करवाई और यह लाश एंजेल की थी. अब मंजू और दिलीप से सख़्त पूछताछ का वक्त आ गया था. इस बार, दोनों कुछ देर बाद ही टूट गए और सच बयान करते हुए पूरी कहानी सुना दी.
अस्ल में, आंगनवाड़ी में साथ काम करते हुए मंजू ने नंदा से तीन लाख रुपये कर्ज़ के तौर पर ब्याज पर लिये थे. रकम न चुका पाने के कारण ब्याज बढ़ता जा रहा था और अब मंजू को 6 लाख रुपये अदा करने थे. वहीं ब्याज पर रकम देने का काम करने वाली नंदा ने मंजू पर रकम लौटाने का दबाव भी बना दिया था. मंजू और दिलीप के पास अदा करने के लिए ये रकम थी भी नहीं और फिर कहीं एक इरादा ये भी था कि यह रकम दबोच ली जाए.’क्या सहेली है तेरी, रोज खिटखिट-खिटखिट करती है पैसों को लेकर. और तू मेरा माथा खराब करती है.’ दिलीप और मंजू के बीच इन पैसों को लेकर आए-दिन तनातनी बनी रहती. ‘पैसा लिया है तो चुकाना भी पड़ेगा ना. कैसे चुकाना है, ये सोचना चाहिए.’ इसी पसोपेश के चलते दोनों जल्द ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि कर्ज़ नहीं चुकाएंगे बल्कि नंदा के पैसे हड़प कर लेंगे.
एंजेल के सामने ही दोनों ने अपने घर पर नंदा को मौत के घाट उतारा, जो छोटी सी एंजेल ने अपनी आंखों से देख लिया. मंजू और दिलीप को डर लगा कि कहीं एंजेल किसी को बता न दे या गवाही न दे दे इसलिए दोनों उसे बहलाकर ले गए और उसे नदी में फेंक दिया. बस, यही दोनों की गलती थी जो उन्हें बाद में भारी पड़ी. इसके बाद घर लौटकर दोनों ने नंदा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचा.

सबसे अच्छी तरकीब उन्हें यही लगी कि लाश को ऐसे ठिकाने लगाया जाए कि लाश कहीं, किसी को मिले ही नहीं. अगली रात को करीब 17 बोरी यानी करीब ढाई सौ किलोग्राम सीमेंट मंगवाया. मंजू और दिलीप ने घर के पास ही बनी पानी की टंकी में लाश डालकर सीमेंट उंड़ेल दिया. पानी में मिलकर सीमेंट कॉंक्रीट हो गया टंकी बन गई नंदा की कब्र. पानी की टंकी से पानी गायब हो गया, टंकी पूरी कॉंक्रीट स्ट्रक्चर बन गई और लाश की गंध आने का कोई जोखिम भी नहीं रहा.
दोनों शातिर अपराधी नहीं थे लेकिन जैसे उन्होंने हत्या और लाश को ठिकाने के काम को अंजाम दिया, तरीका बिल्कुल शातिराना था. नंदा के गायब होने के पूरे दस दिन बाद पुलिस ने टंकी तुड़वाकर नंदा की लाश बरामद की और उसे पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा.
(स्टोरी इनपुट्स : गुजरात ब्यूरो, न्यूज़18)
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