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ये कहानी स्वाति शर्मा की है. वे दिल्ली में पोस्टग्रेजुएशन कर रही हैं. बिहार से आई स्वाति दिल्ली में खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरीं. उन्हीं लम्हों से जुड़ा एक किस्सा वे साझा कर रही हैं.बिहार के पश्चिमी चंपारण से 12वीं करके दिल्ली आई थी. दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने से पहले सिर्फ एक बार यहां आई थी. हम ट्रेन से आए, मां-पापा साथ थे. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरे. यहां से सीधे पहुंचे करोल बाग जहां मेरे मामा- मामी रहते थे. रात भर आराम करने के बाद अगली ही सुबह शुरू हुआ कॉलेज की भागदौड़ का सिलसिला. दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के कॉलेज में बॉटनी ऑनर्स में दाखिला मिला. लेकिन रहने का बंदोबस्त करने में पसीने निकल गए. यूनिवर्सिटी के करीब हर इलाके का पीजी देखा. सत्य निकेतन का एक पीजी ठीक लगा. 5500 रुपए किराया, एक रूम में 4 लोग, चारों का एक वॉशरूम.
अब समझ आने लगा था घर छोड़कर बाहर अकेले रहना कितना मुश्किल है. पीजी की दुनिया की अपनी अलग ही चुनौतियां हैं. कभी मेस का वो खाना जो किसी सजा से कम नहीं था तो कभी रूममेट से अनबन जैसी परेशानियां सामने आने लगी थीं. हर चीज तो जैसे-तैसे झेल ली जाएं लेकिन अगर ढंग का खाना न मिले तो जिंदगी खत्म सी लगती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था. यहां की पत्थर से भी मजबूत रोटियां, दाल का हाल भी बेहाल. ऐसा लगता था कि जैसे कई तरह की बीमारियों को दूर करने वाली दाल को ही बीमारी लग गई है. उसकी हालत इतनी पतली थी. देखकर उस पर तरस ही आ जाता था कि दाल खुद ही इतने कष्ट में हैं. खाकर उसे और तकलीफ क्यों देनी? सब्जी की स्थिति भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं था.
मेस वाले सब्जी के साथ ऐसा व्यवहार करते थे, जैसे वो भी हमारी तरह अकेलेपन का शिकार हो गई हो. उसे भी कोई अपना मिल जाए तो शायद कुछ रंगत आ जाए. मेस में दाल, सब्जी और रोटी के साथ हो रहा ऐसा व्यवहार बिल्कुल नागवार गुजरता था लेकिन मैं करती भी क्या? सामने वाले रूम में रहने वाली लड़कियां तान्या और शैफाली छिपकर ‘मैगी’ बनाती थीं. ये बात मुझे पता थी. मैगी के ख्याल से ही मेरे मुंह में पानी आ गया. मैंने पूरी बेशर्मी दिखाते हुए उनसे मैगी मांगी. 4 चम्मच से मेरा पेट तो नहीं भरा लेकिन हां दिल भर गया. लंबे अरसे बाद ऐसा लगा कि जैसे पेट और आत्मा दोनों को सुकून मिला हो.उसके बाद तो मैंने सोचा कि अब तो भूखे का एक सहारा मैगी ही खाया करूंगींं लेकिन मन में फौरन सवाल कौंधा कि आखिर इन लोगों ने इसे बनाया कैसे? दरअसल पीजी में कुछ बनाने की इजाज़त नहीं थी. इसलिए मैंने बिना देरी किए उससे पूछा कि आखिर कैसे बनाती हो, पता चला कि उन्होंने एक नया अविष्कार किया है! तान्या और शैफाली मोमब्बती पर रखकर मैगी बनाती थी. दो मिनट में बनने वाली मैगी आधी घंटे में उस पर बन जाती थी. सबकी बकायदा अपनी-अपनी बारी से दस मिनट मोमब्बती के आगे पैन पकड़ के रखती थीं. मेकिंग मैथेड जानने के बाद मैंने भी इस प्रोसेस को पूरी तरह आत्मसात कर लिया. मैगी भी बनती रही और एक कभी ना भूल पाने वाली याद भी.
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Article source: https://hindi.news18.com/news/nation/kashmir-loc-pakistani-sniper-indian-soldier-injured-1440289.html
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