Tuesday, 27 November 2018

बिहार की 'भागी' हुई लड़कियां : ये आती कहां से हैं!


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(सभी इलस्ट्रेशन्स – प्रशांत)‘गंदी लड़कियां, वो गंदी लड़कियां होती हैं. यहां कोई शरीफ लड़कियां आती हैं क्या, लड़-वड़ कर, भाग-वाग कर आ जाती हैं यहां पर.’ ऐसा कहना है पटना के एक शेल्टर होम के पास रहने वाले पड़ोसियों का. वैसे मुजफ्फरपुर के ‘उस’ बालिका गृह के आसपास के लोगों से भी हमने बात की तो जवाब इससे कुछ मिलता-जुलता ही था. एक लड़की का कहना था – “हमें तो बस इतना पता था कि ये लड़कियों की ‘जेल’ है.” उस बालिका गृह के पास सालों से रहने वाले लोगों के मुताबिक जो बच्चियां या लड़कियां वहां रह रही थी, वो जरूर कोई अपराध करके आई थीं. जबकि यह सरासर गलत है. दरअसल उस बालिका गृह में उन बच्चियों (6-18) को लाया जाता था जो जरूरतमंद होती थी. अलग अलग परिस्थितियों में इन्हें यहां लाया जाता है.


आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ के एक हिस्से से इसे समझा जा सकता है –


अगर एक लड़की भागती है, तो यह हमेशा जरूरी नहीं


कि लड़का भी भागा होगा


कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं


जिनके साथ वह जा सकती है


कुछ भी कर सकती है


महज़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है


वैसे कविता से ज्यादा इसे ठीक से समझने के लिए पढ़िए ऐसी ही कुछ लड़कियों की कहानी जो शेल्टर होम्स में रह रही हैं. ये मुजफ्फरपुर की बच्चियां नहीं है लेकिन कमोबेश इनकी कहानी कुछ ऐसी ही है –


muzaffarpur shelter home, bihar


श्यामली के पिता ने उसे 3 साल की उम्र में बेच दिया था

श्यामली (नाम बदला हुआ) आरा जिले की है. जिस शेल्टर होम में आसरा मिला था, अब वहीं काम भी करती है.


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कुछ लड़कियां, घर होते हुए भी बेघर हैं, लक्ष्मी (नाम बदला हुआ) ऐसी ही एक लड़की है जिसे नशे की लत है. चार पांच साल से वो एक नशा मुक्ति सेंटर में रह रही है. उसे बार बार घर भेजा जाता है लेकिन फिर नशा करने लगती है. नशे की लत की वजह से लक्ष्मी ठीक से बोल भी नहीं पाती –


muzaffarpur shelter home, bihar


बच्चियां छोटी उम्र में नशे के लिए सोल्यूशन लेती हुई पाई जाती हैं.

बिहार की ‘भागी’ हुई लड़कियां : घर नहीं, ‘कार्यक्रम’ में जाती हैं


ऐसे ही एक शेल्टर होम में सोनू (नाम बदला हुआ) रहता है. जब  7-8 साल का था तब अमृतसर से भागकर पटना आ गया था. चार पांच साल से यहीं है. घर जाना चाहता है और नहीं भी.


muzaffarpur shelter home, bihar


बच्चों के परिवार के हालात उन्हें भागने के लिए मजबूर कर देते हैं

शेल्टर होम में रहने वाली कई लड़कियां, मनपसंद लड़के से शादी न हो पने की वजह से घरवालों से लड़कर भी आती हैं. रोशनी (नाम बदला हुआ) ऐसी ही एक लड़की है.


muzaffarpur shelter home, bihar


रोशनी की अपने परिवार वालों से लड़ाई हो गई थी

बिहार के ही नहीं, देश के अलग अलग शेल्टर होम्स में रहने वाली लड़कियों की कहानियों इन सबसे मिलती जुलती है. इनमें से कोई रेल्वे स्टेशन पर रहती हैं, कोई मंदिर में, कोई पुल के नीचे, बाजार में, या बस स्टॉप पर अपना ठिकाना बनाकर रखती हैं. पटना जंक्शन के नज़दीक प्रसिद्ध महावीर मंदिर के पास ऐसी कई बच्चियां पाई जाती हैं. इसके अलावा पटना के गांधी मैदान के पास भी बच्चियां नशा करती हुई या भटकी हुई मिलती हैं. इनमें से कई बेघर होती हैं औऱ कईयों के घर होते हुए भी उनका कोई आसरा नहीं होता. कुछ का सड़क पर सफर बचपन से ही शुरू हो जाता है. 2016 में सेव द चिल्ड्रन की एक स्टडी में पाया गया कि सड़क पर रहने वाले बच्चों में 37% लड़कियां होती हैं. यह सर्वे लखनऊ, मुगलसराय, हैदराबाद, पटना कोलकाता-हावड़ा में किया गया.


इंडिया स्पेंड ने 2016 की अपनी रिपोर्ट में 2011 के जनगणना डाटा का इस्तेमाल करके अनुमान लगाया कि भारत के 6.8% यानि 26 हजार बेघर परिवारों का ऊपर लिखे पांच शहरों में सबसे ज्यादा ठिकाना है. इनमें सड़क पर रहने वाली लड़कियों की तादाद पटना में सबसे ज्यादा (43%) है.  हालांकि स्थायी ठिकाना नहीं होने और किसी राष्ट्रीय सर्वे में सड़क पर रहने वाले बच्चों को जगह नहीं मिलने की वजह से इन बच्चों और उनमें से भी बेघर या बेसहारा लड़कियों का सही आंकड़ा निकालना मुश्किल है.


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