Friday, 30 November 2018

अंग्रेजों ने नहीं निकलने दिया था अयोध्या मसले का हल, ऐसे रोका मंदिर का निर्माण


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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल इस तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.न्यूज़18 हिंदी एक सीरीज़ की शक्ल में अयोध्या की अनसुनी कहानियां लेकर आ रहा है. इसमें 6 दिसंबर तक हम आपको रोज एक ऐसी नई कहानी सुनाएंगे, जो आपने पहले कहीं पढ़ी या सुनी नहीं होगी. हम इन कहानियों के अहम किरदारों के बारे में भी बताएंगे.


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अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.इस सीरीज़ की दसवीं कहानी में पढ़िए कि कैसे अंग्रेजों ने साजिशन अयोध्या मसले का हल नहीं निकलने दिया. कैसे अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच समझौते को नहीं होने दिया. पढ़िए इस कहानी में…
ऐसा नहीं कि देश के आजाद होने के बाद ही हिंदुओं ने राम मंदिर के निर्माण की बात की हो. देश में मुगल काल खत्म होने और अंग्रेजों का राज शुरू होने के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बातें शुरू हो गई थीं.


राम मंदिर बनाने के आंदोलन का पहला रिकॉर्ड 1853 का मिलता है. यह पहला मौका था जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा हुई. उसके बाद से हर साल अयोध्या अलर्ट पर रहता था, लेकिन कभी बड़ी हिंसा नहीं हुई. आपसी तनाव को दूर करने के लिए स्थानीय लोगों ने इस विवाद का हल निकालने की कोशिशें शुरू कर दीं. कई सालों के प्रयास के बाद 1859 में हिंदुओं और मुसलमानों में शांति बहाली का रास्ता तय हो गया था.


इस बात का कोई ऐतिसाहसिक दस्तावेज तो नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि विवादित परिसर में एक हिस्से में राम मंदिर और दूसरे हिस्से में मस्जिद की बात तय हो गई थी.


हालांकि, तब तक देश में भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अंग्रेजों की स्थिति कमजोर होने लगी थी और अंग्रेज अधिकारी किसी भी हालत में हिंदू-मुस्लिम एकता नहीं चाहते थे. स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के हवाले से वहां सीजेएम रहे सीडी राय बताते हैं कि समझौता होने की खबर के बाद अंग्रेजी सरकार किसी तरह समझौते को रद्द कराकर वहां हिंदू-मुस्लिम विवाद बने रहने देना चाहती थी.


इसी साजिश के तहत समझौते के 2 पक्षकारों की हत्या कराकर उनके शव वहीं एक पेड़ पर टांग दिए गए, जिससे अयोध्या में हिंसा फैल गई. उसके बाद 1859 में ही ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी. उसके बाद मामले में समझौत की हर कोशिश बेकार रही. स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले अंग्रेज हुकूमत और बाद में राजनेताओं ने समझौते की किसी कोशिश को परवान चढ़ने नहीं दिया.


 


पढ़ें सीरीज की अन्य कहानियां
भाग 1- राजीव गांधी नहीं, इस शख्स ने खुलवाया था ताला
भाग 2- एक साधु की ललकार सुन मंदिर मामले पर सुनवाई को मजबूर हुए थे फैजाबाद के जिला जज
भाग 3- कौन था वो काला बंदर जो अयोध्या पर फैसले के दिन हर जगह नजर आया
भाग 4- अयोध्या पर फैसला देने वाले जज साहब की जान को किससे था खतरा?
भाग 5- अयोध्या के अनसुने किस्सेः मुलायम ने कैसे रोका जिला जज पांडे का प्रमोशन?
भाग 6- अयोध्या: रिटायरमेंट के बाद किसने कराया जज साहब का प्रमोशन
भाग 7- अयोध्या: मंदिर में ताला किसने लगाया?
भाग 8- अयोध्या: किसने दिया पूजा शुरू करने का आदेश?


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