Monday, 30 July 2018

भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग को प्रभावित कर रहा है चीनी आयात


READ MORE

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। चीन से निरंतर बढ़ते आयात की कीमत भारतीय उद्योग को चुकानी पड़ रही है। चीन की सरकार की तरफ से मिल रहे भारी भरकम प्रोत्साहन देश की घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को प्रभावित कर रहे हैं। इन प्रोत्साहनों के चलते भारतीय उत्पाद घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते जा रहे हैं।


चीन के निर्यात प्रोत्साहन भारतीय कंपनियों के उत्पादों को कर रहे मुकाबले से बाहर


यह निष्कर्ष संसद की एक स्थायी समिति है जिसने हाल ही में चीनी आयात और उसके भारतीय उद्योगों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का आकलन किया। इस आकलन में समिति ने पाया कि चीन के उत्पादों के भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धी होने की बड़ी वजह उनकी कम कीमत है। इन उत्पादों की कीमत में कमी की एक बड़ी वजह चीनी कंपनियों को निर्यात पर मिलने वाली 17 फीसद सरकारी राहत। इससे चीन की कंपनियों के उत्पाद उनकी भारतीय समकक्ष कंपनियों के उत्पादों के मुकाबले 5-6 फीसद सस्ते हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त चीन जिन प्रांतों में कंपनियों की उत्पादन इकाइयां होती हैं उनसे उन्हें अलग राहत और प्रोत्साहन मिलता है।




यह भी पढ़ें


कर्ज की दर, लाजिस्टिक्स का खर्च और अन्य लागत में भी चीन से पिछड़ रही भारतीय कंपनियां


समिति का मानना है कि चीन केवल विश्व व्यापार संगठन के नियमों को अनदेखा कर ही अपनी मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों का समर्थन नहीं कर रहा, बल्कि सरकार की अन्य नीतियां भी उद्योगों के लिए मददगार साबित हो रही हैं। चीन में ब्याज दरें भी उद्योगों के अनुकूल हैं। भारत में जहां उद्योगों को कर्ज लेने पर 11 से 14 फीसद तक ब्याज अदा करना पड़ता है वहीं चीन के उद्योगों को मात्र छह फीसद ब्याज पर कर्ज उपलब्ध है। यहां तक कि चीन के उद्योगों के लिए लाजिस्टिक्स की लागत भी भारत के मुकाबले कम है।




यह भी पढ़ें


समिति के मुताबिक चीन में यह लागत कारोबार का एक फीसद है जबकि भारत में यह तीन फीसद बैठती है। बिजली, वित्तीय और लाजिस्टिक्स को मिलाकर भारत और चीन की लागत में करीब नौ फीसद का अंतर है।


समिति ने व्यापार में चीन के प्रतिस्पर्धी होने की वजहों को गिनाते हुए कहा है कि चीन बड़े पैमाने पर कंज्यूमर उत्पादों का निर्माण करता है जिससे उसकी उत्पादन लागत काफी कम हो जाती है। साथ ही चीन की कंपनियां विभिन्न क्वालिटी के उत्पाद बनाती हैं जिनमें सस्ते और खराब क्वालिटी के उत्पाद भी शामिल हैं। यही सस्ते उत्पाद भारतीय बाजार में बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं।




यह भी पढ़ें


2017-18 में भारत और चीन के बीच 89.6 अरब डालर का द्विपक्षीय कारोबार हुआ। इस अवधि में भारत के कुल व्यापार में चीनी उत्पादों की हिस्सेदारी 16.6 फीसद रही जो 2013-14 में 11.6 फीसद थी। दोनों देशों के एक दूसरे को किये गये निर्यात और आयात में हुई वृद्धि का अंतर इसी बात से समझा जा सकता है कि 2007-08 से 2017-18 के बीच भारत से चीन को होने वाले निर्यात में मात्र 2.5 अरब डालर की वृद्धि हुई। लेकिन चीन से होने वाला आयात इस अवधि में 50 अरब डॉलर बढ़ गया।


समिति का मानना है कि चीन के आयात का भारतीय उद्योग को इस कदर प्रभावित कर रहा है कि कई मैन्यूफैक्चरर ट्रेडर में तब्दील हो गये हैं। समिति का मानना है कि सरकार ने जिस प्रकार मोबाइल फोन पर आयात शुल्क की व्यवस्था लागू की है और चरणबद्ध मैन्यूफैक्चरिंग कार्यक्रम अमल में लाया है उसने चीन से मोबाइल हैंडसेट के आयात में कमी की है। इस तरह के उपाय अन्य उत्पादों के लिए भी लागू करने की आवश्यकता बताई है।




यह भी पढ़ें


समिति का कहना है कि घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग की रफ्तार बढ़ाने के लिए उन्हें चीनी कंपनियों की तरह के प्रोत्साहन मेक इन इंडिया की नीति के तहत मिलना चाहिए।


जानकारों का मानना है कि ऐसा होने पर ही भारतीय और अन्य देशों की कंपनियां भारत में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में रुचि दिखाएंगी। गौरतलब है कि हाल ही में सैमसंग ने भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग इकाई स्थापित की है।



 



By Bhupendra Singh


Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/khel/russia-and-slowakia-enters-in-euro-2016-416978.html

No comments:

Post a Comment