Tuesday, 31 July 2018

डाक्टरों को बच्चियों का खतना करने का आदेश नहीं दे सकते


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माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों के दाऊदी बोहरा समाज में प्रचलित महिलाओं के खतना प्रथा पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके पीछ आखिर क्या वैज्ञानिक आधार है। कोर्ट डाक्टरों को छोटी बच्चियों का खतना करने का आदेश नहीं दे सकता। इतना ही नहीं कोर्ट ने कहा कि इस प्रथा को संवैधानिक प्रावधानों पर परखा जाएगा। प्रथा का समर्थन करने वाले ये साबित करें कि ये प्रचलन धर्म का अभिन्न हिस्सा है और ये उन्हें संविधान के अनुच्छेद 26 में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में आता है।


ये टिप्पणियां मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिलाओं के खतना पर रोक की मांग पर सुनवाई के दौरान की। प्रथा के पक्ष में दलीलें दे रहे दाऊदी बोहरा वोमेन एसोसिएशन फार रिलीजियस फ्रीडम के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने जब कहा कि प्रथा को महिला का निजी अंग काटना कहना गलत है ऐसा अफ्रीका में होता है। भारत के दाऊदी बोहरा समाज में महिलाओं का खाफ्ज होता है जिसमें निजीं अंग काटा नहीं जाता सिर्फ उसमें हल्का निशान लगाया जाता है। ये क्रूर या कष्टदायक नहीं है। इसे पवित्रता चिन्ह कहा जाता है।ये धर्म का अभिन्न हिस्सा है। इसे मां की मौजूदगी में प्रशिक्षित दायी अंजाम देती है। इसकी तय प्रक्रिया है।




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इन दलीलों पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि ये प्रक्रिया न तो अस्पताल में होती है और न ही इसे प्रशिक्षित डाक्टर करता है। बेहोशी की दवा (एनेश्थीशिया) भी नहीं दी जाती। कोर्ट ने सवाल किया कि 7 साल की बच्ची जब इसका प्रतिरोध करती है तो उसे कौन पकड़ता है। सिंघवी ने कहा कि कोर्ट आदेश दे दे कि आगे से इसे सिर्फ प्रशिक्षित डाक्टर करेंगें। कोर्ट उनका बयान दर्ज कर सकता है। वे इस प्रक्रिया को डाक्टर से कराने को तैयार हैं। इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि क्या आप ये चाहते हैं कि कोर्ट अनुच्छेद 142 के में प्राप्त शक्ति के तहत डाक्टरों को ये आदेश दे कि वे बच्चियों की खतना प्रक्रिया सिर्फ अस्पताल में करें। कोर्ट ये आदेश कैसे दे सकता है। इस प्रथा के पीछे क्या वैज्ञानिक आधार है। जिस चीज का वैज्ञानिक आधार नहीं होता डाक्टर उसे नहीं करता। कोई भी डाक्टर ऐसा नहीं करेगा।


सिंघवी ने कहा कि पूरे मुस्लिम समाज मे पुरुषों का खतना होता है कहीं कहीं महिलाओँ का भी होता है। महिलाओं के खतने पर रोक लगाना बराबरी के मौलिक अधिकार का हनन है। उन्होंने कहा कि बच्चे तो टीका (वैक्सीनेशन) का भी विरोध करते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि पुरषों का खतना जन्म के सात दिन में होता है। उसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा माने जाने की रिपोर्ट है। जबकि इसमें नहीं है और टीका लगने से बच्चे को बाद में ब्लीडिंग और दर्द नहीं होता। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस प्रथा को संवैधानिक प्रावधानों की निगाह से देखा जाएगा वे साबित करें कि ये धर्म का अभिन्न हिस्सा है। बहस नौ अगस्त को फिर होगी।




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केन्द्र ने बताया मौलिक अधिकार का हनन


केन्द्र ने प्रथा का विरोध करते हुए कहा कि ये जीवन के मौलिक अधिकार का हनन है। जैसे सती और देवदासी प्रथा पर रोक लगाई गई है वैसे ही इस पर भी लगनी चाहिए। अगर किसी बच्चे के साथ बचपन में अन्याय होता है तो वह बालिग होने पर मुकदमा कर सकता है लेकिन ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे बाद में बदला नहीं जा सकता। ये कष्टकारक है इसे धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं कहा जा सकता।


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By Ravindra Pratap Sing


Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/desh/finance-minister-arun-jaitley-aiims-convocation-418577.html

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