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(सौम्यदीप चौधरी)राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से दूर जब भी मै अपने घर फोन करता हूं तो मुझे घबराहट होने लगती है. हालांकि न ही मेरा, न मेरे बच्चों का और न ही मेरे भाई का जन्म असम में हुआ है और न ही निकट भविष्य में वहां बच्चों के साथ बसने की कोई योजना ही है लेकिन फिर भी अपने पिता के माध्यम से हमारा वहां से संबंध है. मेरा पैतृक गांव दक्षिण असम में है.
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इस साल जनवरी में जब एनआरसी का पहला ड्राफ्ट जारी किया गया था तो उसमें मेरे पिता और मां का नाम तो था लेकिन उसके बाद की दो पीढ़ियों का नाम उसमें गायब था. इसके बाद मेरे भाई ने शिलांग से करीमगंज जाकर डाक्युमेंट को वैरीफाई करवाया ताकि गलतियों को फाइनल ड्राफ्ट में सुधारा जा सके.फाइनल ड्राफ्ट आने पर जब मैने उत्साहित होकर गवर्नमेंट वेबसाइट पर जाकर एआरएन नंबर टाइप किया तो उसमें सिर्फ मेरे भतीजे और भतीजी का ही नाम अपडेट किया गया था. मै, मेरा भाई, मेरी पत्नी, मेरी बेटे और करीबी रिश्तेदार का नाम लिस्ट से नदारद था.
मेर भाई शुभदीप चौधरी ने फोन पर मुझसे कहा, ‘एनआरसी में मां-बाप का नाम है लेकिन मेरा नाम नहीं है. क्या यही ‘बिना गलतियों वाला’ एनआरसी है जिसका वादा हमसे किया गया था.
तार्किक रूप से अगर मां-बाप का नाम लिस्ट में है तो बच्चों का नाम भी होना चाहिए लेकिन मेरे मामले में देखा जाए तो बच्चों का नाम नहीं है पर पोते पोतियों का नाम है. जिसका सीधा सा अर्थ है कि बीच में एक पीढ़ी की नागरिकता को छोड़ दिया गया.
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जहां तक मेरे परिवार की बात है, हो सकता है कि मेरे लिए ये सिर्फ रिकॉर्ड रखने तक ही सीमित हो लेकिन दूसरे लाखों लोगों के लिए ये नींद उड़ा देने वाली घटना होगी. आखिर लिस्ट में नाम न होने का क्या मतलब है. अब आगे क्या होगा.
जिन लोगों को अपनी नागरिकता को लेकर लड़ना पड़ता है उनको ही पता है कि नागरिकता छिनने का क्या मतलब होता है. और असम में इस तरह के तमाम मामले हैं जो सिद्ध करते हैं कि उनका डर बेबुनियाद नहीं है.
Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/khel/india-vs-zimbabwe-team-india-kl-rahul-jasprit-bumrah-super-game-2-489323.html
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