Sunday, 28 October 2018

ग्राउंड रिपोर्ट: दंगों के घाव से कितने उबरे हैं मुजफ्फरनगर के मुसलमान?


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2013 में मुजफ्फरनगर दंगो में ना जाने कितने घर उजड़े थे. ना जाने कितनी इंसानी जिंदगी पटरी से उतरी. सरकारी आकड़े की मानें तो दंगो के दौरान 60 लोगों को मार दिया गया था. करीब 50000 लोग बेघर हुए थे. हजारों लोगों के रहने का ठिकाना राहत कैंप हो गया था. ये वो लोग थे जिनके अपने खेत थे. अपनी ज़मीन थी. लेकिन जान गंवाने का डर उन्हें अपना सबकुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिया. सदियों से साथ रहने वाले जाटों और मुस्लिमों में दूरी आ गई. ऐसे में सवाल है कि क्या पांच साल पहले रिश्तों में पड़ी दरार में फासले कितने कम हुए. हमने मुज्जफरनगर के गांवों में में ये जानने की कोशिश की दंगों की आंच से बिगड़े समाजिक ताने-बाने में मुज्जफरनगर कितना उबरा है.दुल्हैरा गांव की कहानी


हमारी शुरूआत हुई दुल्हैरा गांव से. जहां पांच साल पहले मुसलमानों ने गांव छोड़ने का फैसला किया था. सालों से एक साथ रहने वाले जाट और मुस्लिम आबादी वाले गांव में सबकुछ बदल गया. दुल्हेरे निवासी बताते हैं कि मुस्लिमों के बिना ये गांव सुना हो गया. हमारा भाई चारा मिट गया. दुल्हैरा में दंगा नहीं था पर भय था. गांववालों ने समझाया लेकिन वो चले गए.


लेकिन दुल्हैरा गांव की कहानी अलग है. दुल्हैरा में एक नया संघर्ष शुरू हुआ. गांव वालों ने फैसला किया कैंप में रहने वाले लोगों को वापस गांव में लाया जाएगा.


इसी दौरान हमारी मुलाकात इरशाद से हुई. इरशाद उस मुस्लिम परिवार के सदस्य हैं जिन्होंने इस कोशिश के तहत गांव वापस लौटे हैं. वो कहते हैं गांव के प्रधान हमारे परिवार के पास आएं. उन्होंने हमें भरोसा दिया. प्यार मोहब्बत तो था ही इन लोगों से इसलिए वापस आ गये. इसका असर दुल्हैरा की मस्जिद में भी पड़ा. अब गांव में अज़ान की आवाज भी गुंजने लगी है और मस्जिदों में नमाज भी शुरू हो गई है.


लोगों को एक दूसरे की जरूरत का एहसास हो रहा है


ऐसी ही एक कोशिश कूटबा में भी की गई. दुल्हैरा से कुटबा की दूरी है महज 3 किलोमीटर है.दिलों को जोड़ने की कोशिश की गई है लेकिन कुटबा में ये कोशिश अबतक नाकाम रही है.



गांव का फिजा ही खत्म कर दी नेताओं ने


हर गांव की अलग कहानी है. काकड़े के तीन लोगों का हत्या हुई थी. 1200 लोग गांव से गए थे. एक भी वापिस नहीं आया है. कोई कहता है कि इसकी वजह डर है.
सोहनवीर सिंह पिछले 5 सालों से गांव के मुसलमानों को वापिस लाने की कोशिश कर रहे हैं. अब आंखे नम है और हौसला पस्त. वो कहते हैं अब उनका लौटना मुश्किल है. घऱ बेच चुके हैं. 5 परसेंट घर ही बचे हैं. हम लोग गए थे. पर प्रयास सफल नहीं हुआ. गांव का फिजा ही खत्म कर दी नेताओं ने.


जाट करते हैं हर रोज इस मस्जिद की सफाई


नन्हेड़ा की मस्जिद वैसे तो 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है लेकिन आज इस मस्जिद के सरंक्षक है गांव के जाट. गांव के लोगों को इबादत का ढंग भले ना पता हो लकिन इंसायित के हर दस्तूर से ये बखूबी वाकिफ हैं. इसीलिए इस मस्जिद में हर रोज सफाई भी होती है और हर साल पुताई भी. देखिए मुज्जफरनगर से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट


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