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(देबानन रॉय)सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर सुनवाई को अगले साल जनवरी तक के लिए टाल दिया है. कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग उठने लगी है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी पर अपने भाषण में कानून बनाने की मांग की थी. वहीं केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सोमवार को कहा कि अब हिंदुओं का सब्र टूट रहा है. वहीं अब विश्व हिंदू परिषद ने भी सरकार से इस संबंध में कानून बनाने की मांग की है.
केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘हिंदू ही नहीं, अधिकांश मुस्लिम भाइयों की भी यही भावना है कि मंदिर बने’
लेकिन जब कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब क्या सरकार उस पर अध्यादेश ला सकती है? आइये जानते हैं कि इस पर क्या है कानूनी एक्सपर्ट्स की राय…संविधान में कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है. हालांकि जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता हो तब सरकार अध्यादेश ला सकती है. हालांकि इस अध्यादेश को छह महीने के अंदर संसद में पारित करना अनिवार्य होता है. पारित नहीं होने पर अध्यादेश के तहत लाया गया कानून समाप्त हो जाता है. साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अध्यादेश लाना संविधान के साथ धोखेबाजी है.
कानूनी जानकारों के मुताबिक, कोर्ट में लंबित मामलों पर अध्यादेश लाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है.
वरिष्ठ अधिवक्ता केएम विजयन ने कहा, “सरकार के पास कानून बनाने का पूरा अधिकार है और मामला कोर्ट में हो या न हो उस पर अध्यादेश लाया जा सकता है.” उन्होंने आगे कहा, “मामला न्यायपालिका में लंबे होने पर भी सरकार अध्यादेश ला सकती है. कोर्ट की भूमिका तब शुरू होती है जब कानून पर अमल शुरू होता है और तब कोर्ट यह तय करता है कि कानून संविधान के दायरे में है या नहीं.”
वहीं संविधान के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं कि न्यायपालिका में लंबित मामलों पर अध्यादेश लाने का चलन नहीं है. उन्होंने कहा, “आमतौर पर ऐसा नहीं होता है. जब मामला न्याय पालिका में है तो उस पर अध्यादेश नहीं लाया जा सकता है. यदि कोई मामला संसद में है तो आमतौर पर कोर्ट उसमें दखल नहीं देता है. इसी तरह कोर्ट में लंबित मामलों पर संसद कानून नहीं बनाता है.” हालांकि उन्होंने कहा कि इसके लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है.
कश्यप से सहमति व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी कहते हैं, “अब तक किसी भी सरकार ने ऐसा नहीं किया है लेकिन इस पर कोई रोक नहीं है. संविधान में इस बारे में कुछ साफ नहीं कहा गया है.”
संविधान के जानकार और लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पीडीटी आचारी इस मुद्दे पर कहते हैं कि यह दो पक्षों का लैंड डिस्प्यूट है और केंद्र सरकार इसमें दखल नहीं दे सकती है. उन्होंने कहा, “राम जन्मभूमि विवाद दो पक्षों का जमीन विवाद है. इस पर कानून कैसे बनाया जा सकता है? यह जमीन की प्राइवेट ओनरशिप का मामला है. प्राइवेट प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद पर सरकार अध्यादेश नहीं ला सकती है. प्राइवेट जमीन केंद्र या राज्य की जमीन नहीं होती है. ऐसा तभी किया जा सकता है जब सरकार जमीन का अधिग्रहण करना चाहती हो. लेकिन किसलिए? एक समुदाय विशेष के लिए मंदिर बनाने के लिए? इसकी अनुमति ही नहीं मिलेगी.”
साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की पीठ ने 2:1 से फैसला दिया था कि 2.77 एकड़ की जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लल्ला के बीच बराबर बांटी जाएगी. इस फैसले के खिलाफ करीब 14 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई हैं.
Article source: https://hindi.news18.com/news/nation/mahishasura-has-been-dressed-as-doctor-in-kolkata-1117381.html
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