Sunday, 25 November 2018

26/11 हमला:  इस कमांडो ने होटल में ऐसे रोके थे आतंकी, वर्ना और बड़ा होता हमला


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10 साल पहले मुम्बई में ताज होटल पर हुए आतंकी हमले को शायद ही कोई देशवासी भूले. पूरे देश ने उस आतंकी हमले को टीवी पर लाइव देखा था. आतंकियों ने होटल को अपने कब्जे में ले लिया था. कई लोगों को मार दिया था तो होटल के कई हिस्सों को आग भी लगा दी थी.लेकिन इसी दौरान नेशनल सिक्योरिटी गॉर्ड (एनएसजी) मौके पर पहुंच गई थी. देशी-विदेशी लोगों को सुराक्षित बचाने के साथ ही एनएसजी का एक कमांडो ऐसा थी था जो गोली लगने के बाद भी बचे हुए आतंकियों को एक कमरे में घेरकर उनसे मोर्चा लेता रहा और जो हमला और भी बड़ा हो सकता था उसे समय रहते खत्म कराने में खास भूमिका निभाई. सेना मैडल से सम्मानित हुए उसी कमांडो सूबेदार फिरेचंद नागर की जुबानी पढ़ा रहे हैं उसे हमले की कहानी.


26/11 की उस शाम मैं अपने परिवार के साथ एनएसजी परिसर में ही था. हमले को देखते हुए समझ में आ गया था कि कभी भी कॉल आ सकती है. और हुआ भी वही. 9 बजे हमे मुम्बई जाने के निर्देश मिले. 10 बजे तक हम पालम एयरपोर्ट से मुम्बई के लिए रवाना हो चुके थे.



ऑपरेशन को अंजाम देने वाली टीम के साथ कमांडो फिरेचंद नागर.

मुम्बई पहुंचते ही होटल में मोर्चा ले लिया. हमारी 80 लोगों की टीम कई हिस्सों में बंट गई. मैं मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की 5 ट्रुप्स टीम में था. सबसे बड़ी परेशानी ये सामने आई कि अभी तक किसी को भी ये साफ नहीं हुआ था कि होटल में कितने आतंकी हैं और कहां-कहां छिपे हुए हैं, हमारे कितने लोग उनके कब्जे में हैं.


सुबह होने से पहले ये तय हुआ कि छत के रास्ते आतंकियों पर हमला बोला जाएगा और होटल को एक-एककर हर फ्लोर को खाली कराया जाएगा. छत के रास्ते हमने तीन फ्लोर खाली करा लिए. कई कमरों में हमे होटल में ठहरे हुए लोग बंद मिले. डर के चलते उन्होंने अपने को कमरों में बंद कर लिया था.



फाइल फोटो- ट्रेनिंग के दौरान कमांडो.

किसी तरह से हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि हम फोर्स के लोग हैं और आपको छुड़ाने आए हैं. तब कहीं जाकर वह कमरा खोल रहे थे. साथ-साथ के हम उन लोगों को नीचे सुराक्षित पहुंचा रहे थे. इस कवायद में चौथे फ्लोर पर आते-आते हम सिर्फ 3 लोग ही बचे थे और बाकी के लोग नीचे होटल के यात्रियों को छोड़ने गए हुए थे.


चौथे फ्लोर पर भी हमे एक कमरा बंद मिला. हमने आवाज़ दी तो कोई जबाव नहीं मिला. हमने उन्हें बताया भी कि हम फोर्स के लोग हैं. लेकिन जब अंदर से कोई जबाव नहीं मिला तो हम समझ गए कि अंदर आतंकी हैं. अब हमने अपनी दूसरी चाल चली. ऐसे मौकों पर हम दीवार की ओट लेकर पैर की ठोकर से दरवाजे को खोलते हैं.


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और मैंने किया भी वैसे ही, लेकिन अंदर बैठा आतंकी तैयार था. जैसे ही दरवाजा खुला उसने तुरंत फायर कर दिया जो मेरे पैर की एढ़ी में लगा और इसी के साथ दरवाजा बंद हो गया. हम 3 लोगों ने तुरंत पोजिशन ले ली. लेकिन इस दौरान तक मुझे ये महसूस नहीं हुआ कि पैर में गोली लग चुकी है. मेरे साथी ने मुझे बताया कि साहब पैर से खून बह रहा है. मुझे नीचे जाने के ऑर्डर मिले. लेकिन मैं पोजिशन को नहीं छोड़ना चाहता था.


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अगर मैं ऐसा करता तो आतंकी अपनी पोजिशन बदल लेते और दूसरे फ्लोर पर पहुंचकर और नुकसान पहुंचा सकते थे. कुछ समय बाद दूसरी टुकड़ी आ गई और मैं 3 बजे अस्पताल के लिए रवाना कर दिया गया.

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