Thursday, 1 November 2018

ANALYSIS: क्‍या कमजोर CBI का फायदा उठाकर 2019 में चुनौती बन पाएगा महागठबंधन


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सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप नया नहीं है. सुप्रीम कोर्ट भी सीबीआई को पिंजरे का तोता कह चुका है. लेकिन जिस तरह इस सर्वोच्च जांच एजेंसी में घमासान मचा हुआ है, उसका फायदा उठाने में कई राजनीतिक दल जुट गए हैं. समीकरणों की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार और चंद्रबाबू नायडू इस मौके के बहाने महागठबंधन की भूमिका तैयार करने में लगे हैं. यानी कह सकते हैं कि जब आप घर में कमजोर होते हैं, तो बाहर वालों को मौका मिल ही जाता है और ये मौका महागठबंधन की चाह रखने वाले कई नेताओं को बखूबी मिल चुका है.सीबीआई और महागठबंधन के गणित को समझने के लिए हमें उन नेताओं की लिस्ट की ओर देखना पड़ेगा, जिनको कभी-न-कभी सीबीआई का डर सताता रहा है. इनमें सबसे पहले नाम उत्तर प्रदेश से बीएसपी सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का है. लालू से लेकर ममता और नायडू समेत क्षेत्रीय दलों के नेताओं को सीबीआई का डर सताता रहा है.


ऐसे में सीबीआई के अंदर मचे घमासान से एक बात साफ हो गई है कि केन्द्र सरकार का सीबीआई पर नियंत्रण कमजोर हो चुका है. मतलब साफ है कि अब सीबीआई के बहाने नेताओं को डराया-धमकाया नहीं जा सकता है. कम से कम कुछ दिनों तक तो यही स्थिति रहनी है, क्योंकि सीबीआई को इस वक्त घर का झगड़ा निपटाने से ही फुर्सत नहीं है और इसमें सरकार के हाथ भी बुरी तरह से झुलस चुके हैं.


ये भी पढ़ें: सीबीआई केस: डीएसपी देवेंद्र कुमार को पटियाला हाउस कोर्ट से मिली जमानतचंद्रबाबू नायडू और शरद पवार महगठबंधन में वो चेहरे हैं, जो त्रिशंकु लोकसभा होने की स्थिति में अपने को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी समझने के लिए तैयार हैं और शायद यही वह कारण है कि जिस महगठबंधन की कोशिश कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को करनी चाहिए वो कोशिश ये दोनों नेता करते दिख रहे हैं.


यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद अखिलेश के साथ जाने की कसमें खाने वाली मायावती के मिजाज भी पिछले दिनों थोड़े बदलते दिखे थे. उन्होंने न सिर्फ बुआ-बबुआ के रिश्ते जोड़ने पर आपत्ति की थी, बल्कि ये भी कहा था कि सीटों को लेकर वो कोई समझौता नहीं करेंगी. इसे सीबीआई जैसी एजेंसियों के दबाव का नतीजा भी माना गया था.


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लेकिन सीबीआई के वर्तमान हालात से उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी गठबंधन की संभावनाएं फिर से बढ़ गई हैं. गठबंधन की बात को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने 27 अक्टूबर को दिल्ली में बीएसपी प्रमुख मायावती, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और बीजेपी के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा से भी मुलाकात की थी. बात करें समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव की तो वो हमेशा से ही नायडू के करीबी दोस्तों में माने जाते हैं.


साफ है कि सीबीआई के अंदर मचे घमासान ने इन नेताओं को मायावती और अखिलेश के साथ आने का मौका दे दिया है. लेकिन जिस तरह मायावती लगातार प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने और राज्य में अपने लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांग रही हैं, उससे गठबंधन की राह उतनी आसान भी नहीं है.


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Article source: http://www.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-15693016.html

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