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टीडीपी प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर से राष्ट्रीय राजनीति में दस्तक देने के लिए तैयार हैं. गुरुवार को उन्होंने ‘लोकतांत्रिक मजबूरियों’ के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से हाथ मिलाया. चंद्रबाबू नायडू की पार्टी एक ऐसे क्षेत्रीय दल के तौर पर उभरे थे जिनका मुख्य मकसद बीजेपी के साथ मिलकर कांग्रेस को हराना था.सिर्फ चार साल पहले चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस के खिलाफ थे. नायडू अपने विरोधी YSR कांग्रेस को कांग्रेस का की रुप कहते थे. इतना ही नहीं टीडीपी वहीं पार्टी है जिसने 1984 के आमचुनाव में कांग्रेस को हराया था.
ज़ाहिर है जब टीडीपी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया तो नायडू और राहुल गांधी से कई सवाल पूछे गए. राहुल ने चंद्रबाबू नायडू से मिलने के बाद बताया, ‘हमारी मुलाकात अच्छी रही. इसका सार ये रहा कि हमें लोकतंत्र और देश के भविष्य को बचाना है. हम पुरानी चीज़ों का ज़िक्र नहीं करेंगे.”
टीडीपी प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू राजनीति के मैदान में पाला बदलने में माहिर हैं. जहां उन्हें फायदा दिखता है वो उसी खेमे में शामिल हो जाते हैं. याद किजिए साल 1996 के चुनाव को जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था. अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया गया था. लेकिन सिर्फ 13 दिनों के बाद बहुमत साबित न करने के चलते उनकी सरकार गिर गई थी.इसी वक्त चंद्रबाबू नायडू ने एक राजनीतिक मोर्चा तैयार किया, जिसमें सीपीआई, सीपीआई (एम), जनता दल, एसपी, द्रमुक, एएफपी, तमिल मनीला कांग्रेस को शामिल किया गया. इस मोर्चे ने कांग्रेस को बाहर से सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया था. इस गठबंधन को यूनाइटेड फ्रंट का नाम दिया गया था. लेकिन दो साल बाद ही ये गठबंधन टूट गया. देवगौड़ा और आई के गुजराल इस गठबंधन के रहते हुए प्रधानमंत्री बने थे.
सरकार गिरने के बाद फिर से चुनाव हुए. वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की जीत हुई. बीजेपी को सहयोगी दल – समता पार्टी, एआईएडीएमके और शिवसेना से समर्थन मिला हुआ था. लेकिन ये सरकार सिर्फ 13 महीनों तक चली. सुब्रमण्यमम स्वामी ने एक टी पार्टी बुलाई जहां जयललिता की सोनिया गांधी से मुलातकात हुई. इसी मुलाकात के बाद जयललिता ने बीजेपी से समर्थन वापस ले लिया. देश में फिर से चुनाव हुए. बीजेपी की जीत हुई और मौके को परखते हुए एन चंद्रबाबू नायडू ने वाजपेयी सरकार को बाहर से समर्थन दे दिया.
1999 से 2004 तक टीडीपी बीजेपी के बाद एनडीए का दूसरा सबसे बड़ा घटक दल था. सरकार में वो प्रधानमंत्री वाजपेयी के बाद दूसरे सबसे अहम व्यक्ति थे. लेकिन 2004 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में वाईएस राजशेखर रेड्डी की अगुआई वाली कांग्रेस के हाथों हारने के बाद, नायडू ने बीजेपी के साथ नाता तोड़ लिया. उन्होंने उस वक्त बीजेपी को एक सांप्रदायिक पार्टी कहा था.
नायडू के एक दोस्त और अनुभवी आंध्र प्रदेश के नेता डॉ एमवी मसूरा रेड्डी ने एक बार कहा था कि अगर कोई व्यक्ति बीजेपी के खिलाफ उनके सभी आरोपों और टिप्पणियों पर किताब लिखे तो वो एक इनसाइक्लोपीडिया में तब्दील हो सकता है.
इसके बाद 2014 में नायडू ने एक बार फिर से बीजेपी के खेमे में वापसी की. टीडीपी ने फिर से एनडीए को समर्थन दिया और एक बार फिर गठबंधन में वो एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में उभरे. हालांकि ये भी कहा जाता है कि नायडू ने एनडीए संयोजक बनने के लिए जम कर गुटबाज़ी की थी. लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला था.
साल 2018 में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने के मुद्दे पर नायडू एक बार फिर से एनडीए से अलग हो गए. एक बार फिर से उसने बीजेपी सरकार पर सांप्रदायिक पार्टी होने का आरोप लगा दिया.
अब देखना होगा कि क्या नायडू 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर बाज़ी मार पाएंगे.
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