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(रशीद किदवई)अयोध्या में एक बार फिर धार्मिक मंडलियों और राजनेताओं की उपस्थिति में धर्म संसद का मुद्दा उफान पर है. यह एनडीए सहयोगियों (बीजेपी और शिवसेना) के बीच खेले जाने वाले एक लंबे ‘चेक एंड मेट’ गेम के हिस्से जैसा है. विवाद सुप्रीम कोर्ट में है और 2019 में कभी भी एक पर फैसला आ सकता है यह जानते हुए भी शिवसेना ‘मंदिर कब बनाओगे’ और ‘पहले मंदिर, फिर सरकार’ जैसे नारों के साथ बीजेपी को घेर रही है.
हालांकि, एक करीबी नजरिया है कि 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए एनडीए इस मुद्दे को केन्द्र में रखते हुए बहुस्तरीय रणनीति बना रही है. इससे यह भी साफ नजर आ रहा है कि संघ परिवार कैसे बड़ी ही चालाकी से दो पार्टियों को एक दूसरे के खिलाफ कर रहा है. इसके पीछे संघ का मकसद राम मंदिर मुद्दे को चर्चा के केंद्र में बनाए रखना, राष्ट्रवाद पर आस्था का प्रभाव बनाए रखने, अल्पसंख्यकों को डराने और अयोध्या को ऐसा मुद्दा बनाने का है जो नरेंद्र मोदी सरकार की छवि को बेहतर बना सके.
एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अयोध्या में युवाओं (जो पहली बार मतदान करेंगे) और 1992 के बाद पैदा हुए उन लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है जिन्हें रामजनमभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की थोड़ी सी भी समझ है.पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे से अयोध्या के मुद्दे पर कोई बड़ा असर होने की संभावना नहीं है. मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ बीजेपी द्वारा दिखाई गई गरीबी के परिणामस्वरूप ‘राष्ट्रीय कानून’ या अयोध्या में ‘भव्य’ राम मंदिर के निर्माण को मंजूरी देने के लिए एक अध्यादेश होगा.
कांग्रेस को अयोध्या से संबंधित घटनाओं में मूक दर्शक के रूप में या फिर समर्थन करने या रहने में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. स्वाभाविक रूप से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता के उस कदम को दोहराने में असमर्थ है जब 1989 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी अयोध्या में सरयू नदी के तट पर अपना लोकसभा अभियान शुरू कर ‘राम राज्य’ का वादा किया था.
राजीव और गृहमंत्री बुटा सिंह ने वहां ‘शिलान्यास’ भी किया था. सन 1986-89 के बीच में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और एनडी तिवारी ने ‘अयोध्या केंद्र’ पर कब्जा करने की कोशिश की थी और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए ‘राजीव मंत्र’ के साथ आगे आए थे.
कांग्रेस दो कारणों से सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले इसके समर्थन से बच रही है. पहला है कि इससे कांग्रेस को कुछ नहीं मिलने वाला. दूसरी और शायद अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अयोध्या में नरसिम्हा राव सरकार ने विवाद स्थल के ठीक सामने 67 एकड़ जमीन पर अधिग्रहण कर लिया था जिस पर कानूनी हस्तक्षेप हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में राव सरकार के अधिग्रहण को बरकरार रखने का फैसला किया था. विवाद पर जिसकी जीत होगी यह भूमि उसे दी जाएगी.
Article source: http://www.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-15715502.html
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