Thursday, 1 November 2018

आचार संहिता से क्यों नहीं डरते हैं नेता?


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जिन्हें देश कानून का राज बहाल करने के लिए चुनता है, वही चुनाव जीतने के लिए कानून तोड़ने लग जाते हैं. चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही चुनाव आचार संहिता लागू हो जाता है, लेकिन उतनी ही जल्दी उसके उल्लंघन की ख़बरें भी आने लगती हैं. बड़े से बड़े नेता भी आम तौर पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन से नहीं कतराते.दरअसल, चुनाव आयोग चुनाव आचार संहिता के नाम पर बातें भले ही बड़ी-बड़ी करता हो, लेकिन उसके पास अधिकार बहुत कम होते हैं. सबसे पहली बात कि आचार संहिता लागू करने का काम जिन अधिकारियों के जिम्मे दिया जाता है, वे सभी राज्य सरकार के अधीन आते हैं. हालांकि चुनाव आयोग को उनके तबादले का अधिकार होता है, लेकिन इससे उनके ऊपर कोई खास असर नहीं पड़ता. साथ ही चुनाव खत्म होते ही नेता, अधिकारी यहां तक कि चुनाव आयोग भी इन सभी मामलों को भूल जाता है.


अगले चुनाव के ठीक पहले चुनाव आयोग इस तरह के मुकदमों की रिपोर्ट मांगता है, लेकिन ये भी कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति ही होती है. एक आरटीआई के जबाब में चुनाव आयोग ने साफ-साफ बताया था कि आयोग के पास चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े आंकड़ों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है.


दरअसल, चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर सज़ा का कोई साफ-साफ प्रावधान नहीं है. सज़ा या मुकदमा आचार संहिता के साथ-साथ उन मामलों में दर्ज होता है, जो आईपीसी की धाराओं में अपराध है और पुलिस भी उसी तरह कार्रवाई भी करती है. किसी-किसी मामले में चुनाव अधिकारी को आर्थिक दंड देने का अधिकार है. लेकिन चुनाव लड़ रहे नेताओं पर इस आर्थिक दंड का कोई असर नहीं होता.आचार संहिता की शिकायत मिलने के बाद चुनाव आयोग सबसे पहले उसपर सफाई मांगता है और ज्यादातर मामलों में सफाई के बाद ही मामला खत्म हो जाता है.


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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के अनुसार ऐसा नहीं है कि चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई नहीं होती. उनकी मानें तो चुनाव आयोग THE REPRESENTATION OF THE PEOPLE ACT, 1951 के तहत आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के साथ-साथ कई ठोस कार्रवाई करता है.



पूर्व मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त एसवाई कुरैशी.

चुनाव खत्म होने के बाद इन मुकदमों के आगे की पैरवी और आंकड़े इकठ्ठा करने के सवाल पर कुरैशी का कहना है कि चुनाव आयोग के पास अपना कोई कर्मचारी नहीं होता और चुनाव के समय राज्य सरकार के कर्मचारी डेपुटेशन पर आते हैं, जोकि चुनाव के बाद वापस चले जाते हैं. ऐसे में चुनाव के बाद चुनाव आयोग के पास उनको निर्देश देने का अधिकार नहीं होता. इन हालात में इन मुकदमों के आगे की पैरवी करना आयोग के लिए संभव नहीं होता. हालांकि आय-व्यय का खर्चा न देने पर आयोग के पास नेताओं के 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का अधिकार है, लेकिन आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई अधिकार नहीं है.


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  1. वर्ष 2000 में आदर्श आचार संहिता कब से लागू हो, इस मामले को लेकर एनडीए की तत्कालीन केंद्र सरकार और चुनाव आयोग में टकराव हुआ था. तब केंद्र सरकार का कहना था कि जिस दिन से चुनाव की अधिसूचना जारी होगी, उस दिन से आचार संहिता लागू हो. चुनाव आयोग घोषणा के साथ ही इसे लागू करने के पक्ष में था. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. लेकिन बाद में सर्वदलीय बैठक के बाद इसे सुलझा लिया गया और आयोग की बात रह गई.


  1. वर्ष 2004 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बेंगलुरू से टुमकूर जनसभा करने सरकारी हवाई जहाज से गए. वहां वे सभा को संबोधित कर रहे थे तभी चुनाव की घोषणा हो गई और उन्हें अपना विमान वहीं छोड़कर कार से बेंगलुरु जाना पड़ा.


  1. पटना में एक जनसभा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी ने भाषण देना शुरू ही किया था कि रात के दस बज गए और तब पटना के जिलाधिकारी गौतम गोस्वामी ने उन्हें मंच से उतरने को कह दिया. बाद में उस अधिकारी को बेहतर काम करने के लिए टाइम मैगजीन की ओर से यंग पर्सन ऑफ द ईयर की उपाधि भी मिली. हालांकि बाद में गौतम गोस्वामी एक घोटाले में फंस गए और बीमारी की वजह से मौत से पहले जेल में बंद रहे.


  2. वर्ष 2004 के चुनाव में बीजेपी नेता लालजी टंडन पर एक कार्यक्रम में गरीबों को साड़ी बांटने के मामले में केस दर्ज किया गया. उस घटना में भगदड़ के बाद कई महिलाओं की मौत भी हो गई थी.




  1. 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक जनसभा में सांप्रदायिक भाषण देने के आरोप में बीजेपी के युवा नेता वरुण गांधी पर केस दर्ज हुआ.



  1. 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने हाथी की तमाम प्रतिमाओं को ढंकने का आदेश दिया था. आयोग ने विभिन्न दलों की ओर से इसपर शिकायत मिलने के बाद इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना था.




  2. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर मुकदमा दर्ज किया गया था. लेकिन जो एक बात तय है और हर चुनावों में दिखती है वे ये कि चुनाव आचार संहिता का भय तो दिखता है, लेकिन उसके उल्लंघन के तमाम मामले भी होते रहते हैं और कार्रवाई के नाम पर सबकुछ सिफर ही रह जाता है. खासतौर से बड़ी पार्टियां और बड़े नेता कम ही आचार संहिता के शिकंजे में आते हैं.



Article source: http://www.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-15693016.html

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