Friday, 2 November 2018

इन छह वजहों के चलते RBI पर नियंत्रण चाहती है मोदी सरकार


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भारतीय रिजर्व बैंक के एक उच्च पदस्थ अधिकारी की ओर से मौद्रिक नीति के मुद्दे पर बीते शुक्रवार एक बयान दिए जाने के बाद सरकार और संस्था के बीच खटास बढ़ गई. यह बात दीगर है कि सरकारों और आरबीआई के बीच मतभेद रहे हैं लेकिन इसका सार्वजनिक होना अचरज में डालता है. इतना ही नहीं बुधवार सुबह तक कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि गवर्नर उर्जित पटेल पद से इस्तीफा दे देंगे, हालांकि आरबीआई ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की.आरबीआई के सूत्रों के मुताबिक सरकार की ओर से आरबीआई को उसके अधिनियम धारा सात के तहत भेजी गईं तीन चिट्ठियों के बाद यह बात आगे बढ़ी.


दूसरी ओर रुपए में आ रही गिरावट और सरकारी बॉण्ड्स की ओर निवेशकों के नकारात्मक रुख के चलते सरकार ने आरबीआई की स्वायत्तता का समर्थन करते हुए एक बयान जारी किया. हालांकि इससे यह संकेत मिल रहे थे कि सरकार अपनी ही राह पर चलेगी.


यह भी पढ़ें: जानिए उन गुरुमूर्ति को, जिनके चलते शुरू हुआ रिजर्व बैंक का विवादशुक्रवार को रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने एक भाषण में चेताया कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता से छेड़छाड़ ‘विनाशकारी’ साबित हो सकती है. विरल आचार्य ने 27 अक्टूबर को कहा था कि जो भी सरकार केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती उसे देर-सबेर वित्तीय बाजारों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है. विरल आचार्य ने एक स्मारक व्याख्यान में कहा था, ‘प्रभावी स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है जिससे जो भी अधिकार (रिजर्व बैंक कानून में) दिये गये हैं उनको व्यवहार में लाया जा सके.’


हालांकि वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने टिप्पणी को खारिज कर दिया.


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वह छह मुद्दे जिस पर है विवाद-


नकदी की मांग
आरबीआई के रिजर्व से राजकोषीय घाटे को निधि में मदद करने के लिए सरकार ने बार-बार पैसे मांगे. आरबीआई वर्तमान में लाभांश के रूप में विभिन्न गतिविधियों से अर्जित अपने मुनाफे देता है, लेकिन सरकार आरबीआई के 3.6 खरब रुपये पूंजीगत भंडार में भी हिस्सा चाहती है. आरबीआई ने लगातार की जा रही इस मांग को खारिज कर दिया.


लिक्विडिटी का मुद्दा
सरकार चाहती है कि आरबीआई बैंकिंग क्षेत्र को और अधिक लिक्विडिटी दे, जो इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएल एंड एफएस) के डिफाल्ट का शिकार हो गई है. इस डिफॉल्‍ट के चलते बॉन्ड और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के शेयरों में बिकवाली शुरू हो गई. सरकार साल 2008-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान इन ऋणदाताओं के लिए दी गई लिक्विडिटी की मांग आरबीआई से कर रही है.


11 बैंकों पर ऋण संबंधी प्रतिबंध
सरकार आरबीआई से 11 सरकारी बैंकों पर अपने उधार प्रतिबंधों को खत्म करने का भी आग्रह कर रही है. बैंकों के पास कम पूंजी आधार और बैड लोन्स की दिक्कत के चलते प्रतिबंध लगाए गए थे. 11 बैंकों को तब तक के लिए उधार देने से रोक दिया गया जब तक उनके बैड लोन का लेवल कम नहीं हो जाता. सरकार का कहना है कि प्रतिबंधों के चलते मध्यम और छोटे वर्ग के व्यवसायों को लोन मिलना मुश्किल हो गया है.


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अतिक्रमण
आरबीआई एक स्वतंत्र भुगतान नियामक स्थापित करने का प्रस्ताव देकर केंद्रीय बैंक की नियामक शक्तियों को कम करने के सरकार के प्रयासों से भी चिंतित है. वर्तमान में आरबीआई अर्थव्यवस्था में सभी भुगतान और निपटान को नियंत्रित करता है. सरकार का कहना है कि यह एक अलग भुगतान नियामक चाहता है जो प्रौद्योगिकी में तेजी से बदलाव के अनुकूल हो सकेगा.


बोर्ड का प्रभाव
सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विचारधारा एस गुरुमूर्ति को इस वर्ष की शुरुआत में पूर्व बैंकर सतीश मराठे के साथ आरबीआई बोर्ड में नियुक्त किया था जिनके संबंध संघ के साथ थे.
इतिहास में ऐसी राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हुई हैं क्योंकि आरबीआई बोर्ड के बाहरी सदस्य ज्यादातर अर्थशास्त्री और उद्योगपति रहे हैं. पारंपरिक रूप से, आरबीआई के बोर्ड ने केंद्रीय बैंक के आंतरिक कार्यों से संबंधित निर्णयों को मंजूरी दे दी है और इसने अपने पर्यवेक्षी और मौद्रिक नीति कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया.


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मौन
वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के साथ ही बीजेपी और आरएसएस के अधिकारी भी गुस्से में हैं कि आरबीआई ने झगड़े को सार्वजनिक कर दिया. आचार्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि उन्हें पटेल द्वारा आजादी के सवाल को संबोधित करने के लिए कहा गया था और एकता के एक शो में तीन अन्य डिप्टी गवर्नर ने अपने भाषण में भाग लिया था. बुधवार को स्वायत्तता से संबंधित अपने बयान में, सरकार ने जोर देकर कहा कि यह चर्चा गोपनीय रखेगी.


क्या हैं इसके मायने?


प्रधानमंत्री मोदी के लिए
साल 2018 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर मोदी सरकार दबाव में है. बढ़ती तेल की कीमतें और कृषि से जुड़ी वस्तुओं की कम कीमत के चलते ग्रामीण आय को नुकसान हो रहा है. सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई है जिससे घाटे पर दबाव बढ़ गया है. इसके अलावा, आईएल एंड एफएस के डिफाल्टर होने से बैंकिंग क्षेत्र में लिक्विडिटी कम हो गई.


यह सब आम चुनाव से कुछ महीने पहले ही अर्थव्यवस्था को धीमा कर सकता है. ऐसा होने से रोकने के लिए, मोदी से ग्रामीण मजदूरी, ईंधन सब्सिडी में वृद्धि और गारंटीकृत न्यूनतम मूल्य पर फसलों को खरीदने सहित लोकप्रिय कार्यक्रमों पर अधिक खर्च करने की उम्मीद है.


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निवेशकों के लिए
इस झगड़े ने राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता पैदा की है. निवेशक यह सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई और सरकार दोनों से नीति निरंतरता चाहते हैं कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखा जाए.


देश में साल 2014 से मुद्रास्फीति दर में लगातार गिरावट जिसका इस्तेमाल मूल्य दबाव को कम करने के लिए किया गया था, ने केंद्रीय बैंक में आत्मविश्वास बढ़ाया और निवेशकों को आकर्षित किया. हालांकि, निवेशकों को डर है कि अगर सरकार आरबीआई को निशाने पर लाती है तो आर्थिक लाभ खतरे में पड़ सकता है.


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Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/politics/rss-people-join-rss-increase-bjp-narendra-modi-mohan-bhagwat-416074.html

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