READ MORE(सिंधु भट्टाचार्य)नरेंद्र मोदी सरकार ने फैसला किया था कि एयर इंडिया को निजी हाथों में बेच दिया जाएगा. हालांकि, सरकार की इस योजना को तगड़ा झटका लगा है. नीलामी के लिए आखिरी तारीख भी खत्म हो गई है. कोई भी बतौर आवेदन आगे नहीं आया. इंडस्ट्री में ऐसी चर्चाएं थीं कि कुछ डोमेस्टिक एयरलाइन और बड़े बिजनेस घराने इसमें इंटरेस्टेड हैं, लेकिन सब महज कल्पनाएं निकलीं.
एक अकेली नीलामी भी ना आने के कारण हो सकता है कि सरकार इस पूरी प्रक्रिया को सरल नियमों के जरिए फिर से शुरू करेगी. अब क्या होगा जब एयर इंडिया में सरकार की हिस्सेदारी के लिए एक भी बोली नहीं मिली ? क्या एयर इंडिया की विनिवेश योजना को खत्म कर दिया जाएगा? इसका मतलब है कि पूरी प्रकिया, शायद ताजा नियम और शर्तों के साथ फिर से शुरू की जाएगी.
अहमदाबाद और जयपुर एयरपोर्ट के लिए निजी डेवलपर्स से बोलियां आमंत्रित करने के हालिया मामले में, इसे वापस लेना पड़ा, क्योंकि केवल एक ही बोली लगाने वाला आगे आया. पूरी प्रक्रिया को फिर से शुरू किया गया. क्या एयर इंडिया के मामले में भी ऐसा ही होगा, जहां संभावित बोली लगाने वालों ने बिक्री की शर्तों के बारे में अपनी आशंकाएं पहले से ही जाहिर की हैं?हालिया घटनाक्रम के करीबी एक स्रोत ने कहा कि इच्छुक पार्टियां सरकार की बोली शर्तों और डिइनवेस्टमेंट टाइमलाइन को कम करने का इंतजार कर रही हैं. इस व्यक्ति ने यह भी कहा कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने भी हालिया बयानों कोई बिक्री नहीं होने पर चेतावनी दी, अगर “पर्याप्त” कीमत प्राप्त नहीं हुई तो सरकार बड़े बदलावों के साथ विनिवेश की पूरी प्रक्रिया को खत्म करने या फिर शुरू करने के लिए जमीन तैयार कर रही है. लेकिन, अंत में एयर इंडिया के संबंध में यहां से क्या होता है यह आखिरकार मोदी के चार भरोसेमंद मंत्रियों – अरुण जेटली, सुरेश प्रभु, नितिन गडकरी और पीयूष गोयल द्वारा तय किया जाएगा.
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वास्तव में एयर इंडिया का विनिवेश कभी उड़ान भर ही नहीं पाया. पहले इसे संभावित बोली लगाने वालों से प्रतिक्रिया मिली, जिसमें एक प्रमुख एयर लाइन पूरे खेल से ही बार निकल रही थी. इसके बाद बचे हुए बोली लगाने वालों ने शर्तों में बदलाव के लिए बात शुरू कर दी, जिसमें कई बुनियादी बातों का विरोध किया गया जो एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट का डॉक्यूमेंट बनाते थे.
इसके साथ ही सरकार के दावे पर भी संशय बढ़ा, क्योंकि विनिवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी 24% हिस्सेदारी बनाए रखने का प्रस्ताव है. बोली लगाने वालों की शिकायतें तब सामने आईं जब अस्पष्ट रूप से शकतिशाली संघ की लॉबी एयर इंडिया को विदेशियों को बेचने के खिलाफ था.
एयर इंडिया के विनिवेश की प्रक्रिया इस साल 28 मार्च को शुरू हुई और इसे आजाद भारत के अब तक सबसे ज्यादा रणनीतिक विनिवेश बताया गया. सरकार ने एआईएसएटीएस में 50% हिस्सेदारी के अलावा एयर इंडिया और इसके एयर इंडिया एक्सप्रेस से 76 फीसदी का स्टेक हटाने का प्रस्ताव दिया था.
कोई भी संभावित बोलीदाता इनमें से कुछ चाहता है: सरकार के साथ पूर्ण नियंत्रण, 24% हिस्सेदारी भी, कमजोर डेब्ट लायबिल्टी और विनिवेश के बाद मैन पॉवर के मुद्दों पर स्पष्टता. सिर्फ बोली लगाने वालों से ही नहीं सरकार को अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. एयर इंडिया विनिवेश का जिक्र करते हुए सुब्रमण्यम स्वामी ने पहले ही ‘घोटाला’ शब्द का इस्तेमाल किया है. स्वदेशी जागरण मंच एयरलाइन के लिए सरकारी स्वामित्व जारी रखने के लिए रोडमैप तैयार कर रहा है और कर्मचारी संघ बिक्री के विरोध में हैं.
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याद रखें, एक गैर-एयरलाइन कंपनी, जिसमें एयरलाइन चलाने में कोई अनुभव नहीं है, एयर इंडिया के लिए बोली लगा सकता है. किसी और चीज के अलावा ये वो मुद्दा है जो दिखाता है कि एयर इंडिया की बिक्री में गलत हो रहा है. यह वो संभावित बिन्दु है जो पूरी बिक्री को आखिरकार चौंका सकता है.
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं.विचार व्यक्तिगत हैं.)
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