Wednesday, 30 May 2018

सरकार भूल गई कोहिमा युद्ध के हीरो को, नहीं रहे लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर चंद बख्शी


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कोहिमा युद्ध के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर चंद बख्शी नहीं रहे. अपने उपनाम ‘जोरू’ से विख्यात लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर चंद बख्शी सबसे अधिक युद्ध मेडल जीतने वाले सेना के जाबांज अधिकारियों में से एक थे. लेकिन युद्ध के इस महान हीरो ने दुनिया को अलविदा कहा तो सबसे अफसोसजनक बात ये रही कि उनकी अंतिम यात्रा में सरकार या सेना की ओर से किसी ने आधिकारिक तौर पर अंतिम विदाई नहीं दी.ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि क्या कोहिमा युद्ध में जीत का परचम लहराने वाले लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर चंद बख्शी अपनी अंतिम सफर में इतने के भी हकदार नहीं थे. बख्शी के निधन पर टीवी के बक्से खामोश रहे, लुटियन जोन में रहने वाले नेता अपने में व्यस्त रहे और हमारा ये हीरो खामोशी के साथ दुनिया को अलविदा कह गया. क्या किसी के कान में उनके जाने की भनक नहीं लगी.


लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर चंद बख्शी आज से 97 साल पहले साल 1921 में रावलपिंडी के गुलियाना में पैदा हुए थे. लेफ्टिनेंट जनरल बख्शी के पिता अंग्रेजों की फौज में थे, जिसका ये असर हुआ कि 22 साल की उम्र में लेफ्टिनेंट जनरल बख्शी फौज के बलोच रेजिमेंट में शामिल हो गए.


फौज के कमीशन अधिकारी जोरावर चंद बख्शी द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने के लिए बर्मा गए. वहां उन्होंने आक्रमणकारी जापान को रोकने में अपनी अहम भूमिका निभाई और इसी बर्मा युद्ध में अपना जौहर दिखाकर जोरावर अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध हो गए. बर्मा से लौटते ही जोरावर चंद बख्शी को अगले मिशन पर मलेशिया भेजा गया, यहां भी उन्होंने अपनी सफलता का झंडा गाड़ दिया.साल 1947 में जब देश आजाद हुआ लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद बख्शी पंजाब बाउंड्री फोर्स का हिस्सा बने. साल 1947 में मिली आज़ादी ने वतन को दो दुकड़ों में बांट दिया. जोरावर सिंह बख्शी का परिवार भी रावलपिंडी के गुलियाना से उजड़कर हिन्दुस्तान आ गया. साल 1948 में जब पाकिस्तानी लड़ाकों ने कश्मीर पर हमला किया तो सीमा पर लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद बख्शी दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए.


पाकिस्तान के साथ युद्ध ख़त्म होने के बाद जोरावर चंद बख्शी बौद्ध लामा बनकर तिब्बत चले गए. तिब्बत से जोरावर 400 मील ट्रैकिंग करके चीन पहुंचे और वहां किसी को भी भनक लगे बिना राज़ मालूम करते रहे. बख्शी जब तिब्बत से वापस लौटे तो इन्हें सेना का मेक-ग्रेगोर मेडल प्रदान किया गया.


सेना में मेग-ग्रेगोर मेडल देने की शुरूआत साल 1888 में हुई थी और आज़ादी के बाद सिर्फ 15 लोगों को ही सेना का यह मेडल मिला. साल 1962 में जब चीन ने हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया तो उस समय जोरावर कॉन्गो में थे. कॉन्गो से वापस लौटे तो साल 1965 में पाकिस्तान ने हमला किया.


साल 1965 के भारत-पाक युद्ध में जोरावर चंद बख्शी जमकर लड़े और पाकिस्तानी फौज को मार भगाया. साल 1971 के भारत-पाक जंग में जोरावर को अखनूर डैगर को जीतने की जिम्मेदारी मिली. अखनूर डैगर को उस जमाने में पाकिस्तान का खंजर कहा जाता था, उसे लेकर जोरावर ने कहा था, “ये डैगर नहीं चिकन्स नेक है और मैं इसे मरोड़ कर रख दूंगा”.


कहा जाता था कि लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद बख्शी भारतीय सेना के सबसे डेकोरेटेड फौजी थे. इनके अदम्य साहस को देखते हुए इन्हें सेना के वीर चक्र, महावीर चक्र, विशिष्ट सेवा मेडल और परम विशिष्ठ सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था.


मेडल के अलावा लेफ्टिनेंट जनरल ज़ोरावर की पहचान थी उनके हाथ में हमेशा रहने वाली एक बेंत. जब कॉन्गो युद्ध में उग्रवादी लीडर शोंबे ने उन्हें उंगली दिखाई थी तो लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर ने उसी बेंत से उंगली को नीचे करते हुए कहा कि दोबारा किसी भारतीय अफसर के साथ ऐसा नहीं करना.


साल 1971 की जंग के बाद लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद बख्शी पूर्वोतर के घने जंगलों में नागा विद्रोहियों से लड़ने चले गए. पूर्वोत्तर से लड़ कर लौटे तो अंबाला स्थित दूसरी कोर के कमांडर रहे. लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद बख्शी भारत के युद्ध हीरो थे.


उनके बारे में मशहूर टाइम मैगजिन ने लिखा था, ‘एक छोटे कद का भारतीय अफसर, जिसका अहम बहुत ऊंचा है’. ऐसे वॉर हीरो के चले जाने पर सरकार और सैन्य अधिकारियों का खामोश रहना, सच में काफी सालता है.

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