
READ MORE
साल 2018 का 5वां महीना अभी ख़त्म भी नहीं हुआ है और लाइन ऑफ़ कंट्रोल (LOC) पर पाकिस्तान की तरफ से सीजफायर उल्लंघन की घटनाओं की संख्या 1250 पहुंच गई है. साल 2017 में ऐसी घटनाओं की संख्या 971 थी. इन घटनाओं में 36 लोगों (सैनिक+सिविलियन) को अपनी जान गंवानी पड़ी है जबकि 120 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं. इसके चलते भारतीय सीमा के आस-पास रहने वाले हजारों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा है. इन घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के बीच 2003 के सीजफायर समझौते को पूरी तरह से लागू करने पर सहमति बन गई है. गौरतलब है कि इस समझौते के बाद भारत-पाक सीमा पर करीब 6 सालों तक शांति बनी रही थी.पाकिस्तान ने की बातचीत की पहल
पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक इस सीजफायर उल्लंघन और बदले में भारतीय सेना की कार्रवाई के चलते सीमा से सटे पाकिस्तानी गांवों के लोगों को भी काफी परेशानी हो रही है. इसी के चलते बातचीत की पहल पाकिस्तान की तरफ से की गई है. भारत की तरफ से डीजीएमओ ले. जनरल अनिल चौहान और पाकिस्तान की तरफ से मेजर जनरल साहिर शमशाद मिर्जा 15 साल पुराने सीजफायर समझौते को पूरी तरह से लागू करने पर सहमत हुए.
भारतीय सेना ने कहा कि यह सुनिश्चित किया गया कि भविष्य में दोनों तरफ से सीजफायर का उल्लंघन नहीं होगा. पाकिस्तानी सेना ने एक बयान जारी कर कहा कि दोनों कमांडरों ने शांति बनाए रखने और सीमा से सटे क्षेत्र में रहने वाले लोगों की मुश्किलें दूर करने के उपायों पर आपसी सहमति व्यक्त की. भारतीय सेना की तरफ से बयान में कहा गया है कि अधिकारी इस बात पर भी सहमत हुए कि किसी भी प्रकार के मुद्दे पर संयम बरता जाएगा और मुद्दे को हॉटलाइन संपर्क और बॉर्डर फ्लैग मीटिंग जैसी मौजूदा प्रणाली के जरिये हल किया जाएगा.
सीमा पर है युद्ध जैसे हालात
साल 2011 से सीजफायर की घटनाओं में अप्रत्याशित इजाफा देखने को मिला है. साल 2011 में पाक की ओर कुल 62 बार सीजफायर तोड़ा गया. साल 2012 में 114 बार, साल 2013 में 347 बार, साल 2014 में 583 बार और साल 2015 में 30 नवंबर तक 405 और साल 2016 में 449 बार युद्धविराम तोड़ जा चुका है. साल 2017 की 971 और 2018 के शुरूआती पांच महीनों की घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चलता है कि घटनाओं में 5 गुना तक इजाफा देखने को मिल रहा है. इसका एक करण ये भी माना जा रहा है कि भारतीय सेना ने बीते एक साल में अपने ऑपरेशंस में 270 से ज्यादा आतंकियों को मार गिराया है.
गौरतलब है कि युद्धविराम किसी भी युद्ध को अस्थायी तौर पर रोकने को जरिया होता है. इसके तहत हुए समझौते में दो पक्ष सीमा पर आक्रामक कार्रवाई न करने का वादा देता हैं. युद्धविराम को आप दो देशों के बीच हुई एक औपचारिक संधि मान सकते हैं. साथ ही इस समझौते के तहत दो देशों के सेनाओं के बीच भी एक अनौपचारिक समझौता होता है. युद्धविराम बॉर्डर पर लड़ाई को खत्म करने के समझौते से कहीं ज्यादा होता है. एक सफल युद्धविराम कभी-कभी शांति समझौते में तब्दील हो जाता है.

क्या है 2003 सीजफायर समझौता
बता दें कि अटल बिहारी वायपेयी की पहल के बाद भारत और पाकिस्तान ने वर्ष 2003 में एलओसी पर एक औपचारिक युद्धविराम का ऐलान किया था. भारत और पाकिस्तान के बीच 25 नवंबर 2003 की आधी रात से युद्धविराम लागू हुआ था हालांकि सीजफायर की इन बढ़ती घटनाओं के बीच बीते 5 सालों में इसका कोई ख़ास महत्व नहीं रह गया था.
90 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद ने अपनी पैठ बनानी शुरू की और पाकिस्तान इसका खुलकर सपोर्ट करता था. पीओके और भारतीय सीमा से सटे पाकिस्तानी इलाकों में पाक सेना खुद आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप चला रही थी. इसी दौरान भारत और पाक सेनाओं के बीच लगातार सीजफायर उल्लंघन की घटनाएं सामने आती थीं. भारतीय सेना लगातार आरोप लगा रही थी कि सीजफायर उल्लंघन के जरिए पाकिस्तानी सेना आतंकियों को सीमा पार कराने का काम कर रही है. 25 नवंबर 2003 की आधी रात से भारत और पाकिस्तान के बीच लागू हुए युद्धविराम का मकसद एलओसी पर 90 के दशक से जारी गोलीबारी को बंद करना था.
भारत और पाकिस्तान के बीच जब सीजफायर लागू हुआ तो उससे पहले साल 2002 में दोनों देश कारगिल के बाद एक और जंग की ओर बढ़ रहे थे. इसकी वजह थी दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हुआ हमला. भारत ने पाक की इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई पर हमले की साजिश का आरोप लगाया था. आगरा समिट के बाद हुए संसद हमले के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस पहल को शक के नज़रिए से भी देखा जा रहा था.

अमेरिकी अखबार लॉस एंजिल्स टाइम्स ने लिखा भी था कि अमेरिका और यूरोप के दबाव में आकर भारत और पाकिस्तान दोनों युद्धविराम पर राजी हुए हैं. दरअसल उस समय जॉर्ज बुश अमेरिका की सत्ता पर काबिज थे और बुश को हमेशा से पाक के लिए एक नरम रुख रखने वाला राष्ट्रपति माना जाता था क्योंकि पाक अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान युद्ध के लिए हवाई अड्डे इस्तेमाल करने दे रहा था. हालांकि जानकारों का मानना है कि कारगिल युद्ध में हार के बाद पाकिस्तान के पास समझौते के अलावा कोई और ऑप्शन बचा भी नहीं था.
दोनों देशों के बीच भरोसा पैदा करना था लक्ष्य
नवंबर 2003 में वाजपेयी की पहल पर भारत ने जो सीबीएम (Confidence Building Measures) पेश किए थे उनमें हवाई. रेल और समुद्री संपर्क के अलावा खेल-कूद संबध जिनमें क्रिकेट सीरीज भी शामिल थे. इसमें दिल्ली और लाहौर के बीच ज्यादा बसें और श्रीनगर से पीओके की राजधानी मुज़फ्फराबाद तक बस सर्विस शुरू करना भी शामिल था. जनवरी 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सार्क की बैठक के लिए पाकिस्तान गए और दोनों देशों ने मिलकर एक साझा बयान भी जारी किया था. हालांकि इसी साल चुनाव में वाजपेयी की हार हुई और मनमोहन सिंह ने बातचीत को आगे बढ़ाया.
2001 में ही बन गई थी सहमति
जुलाई 2001 में उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ आगरा सम्मेलन के दौरान मिले थे. इस सम्मेलन के बाद दोनों देशों के बीच तनाव में कुछ कमी देखने को मिली लेकिन संसद पर आतंकी हमले के बाद संबंध फिर से मुश्किल हो गए. इस समझौते की एक वजह एक और भी थी कि साल 1989 से 2003 तक सीमा पर जारी गोलीबारी में दोनों देशों के 65,000 से ज्यादा लोग की जान चली गई थी. ये समझौता 450 मील लंबी एलओसी, इंटरनेशनल बॉर्डर और सियाचिन ग्लेशियर पर भी लागू हुआ था. इस समझौते से दो दिन पहल पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर जफरुल्ला खान जमाली ने ईद के मौके पर युद्धविराम की पेशकश की थी. युद्धविराम के बाद ईद की मिठाईयां भी बांटी गई थी.
भारतीय सेना का रुख अब भी वही है
2003 में हुए समझौते के दौरान भी भारतीय सेना की तरफ से जारी बयान में एक बात साफ़ कर दी गई थी कि युद्धविराम की सफलता पाकिस्तान पर निर्भर करती है. पाकिस्तान को आतंकियों को भारत की सीमा में दाखिल होने और इंडियन आर्मी ट्रूप्स और नागरिकों पर हमला करने से रोकना होगा. वहीं इंडियन आर्मी ने पाक को चेतावनी दी थी कि अगर आतंकी सीमा के अंदर दाखिल हुए और हमले की कोशिश की गई तो फिर उन्हें माकूल जवाब दिया जाएगा. इस बार भी ये साफ कर दिया गया है कि अगर पाकिस्तान की तरफ से शेलिंग हुई तो उसका माकूल जवाब दिया जाएगा.

भारतीय सेना ने साल 1990 में से एलओसी पर बैरियर्स लगाने का काम शुरू किया था, इसे आतंकी घुसपैठ रोकने के नज़रिए से शुरू किया गया था. भारतीय सेना का आरोप था कि सीजफायर उल्लंघन इस काम को रोकने के लिए भी किया जा रहा है क्योंकि पाक सेना ही घुसपैठ में आतंकियों की मदद कर रही है. साल 2000 में लगातार सीजफायर की घटनाओं से इस काम को लगभग रोक दिया गया था. हालांकि समझौते के बाद 30 सितंबर 2004 को कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में एलओसी की फेंसिग का काम पूरा हो गया. इंडियन आर्मी के मुताबिक एलओसी पर फेंसिंग की वजह से आतंकियों की घुसपैठ में कई गुना कमी आई थी. हालांकि पाक ने एक बार फिर रंग दिखाया और कहा कि भारत ऐसा करके समझौते का उल्लंघन कर रहा है.
क्या इससे फिर सीमा पर शांति होगी
जानकारों का मानना है कि दोनों ही देशों में जल्द आम चुनाव हैं और सीमा पर जारी तनाव के साथ दोनों में से किसी भी देश की सरकार फिलहाल चुनाव प्रचार के मैदान में नहीं उतरना चाहती है. इसके आलावा सीमा पर रोज़ मरते सैनिक और बेघर होते लोगों को लेकर भी दोनों देशों की सरकार का रवैया गंभीर हुआ है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने गोलीबारी में बर्बाद हुए घरों में रहने वाले परिवारों को 5 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की है.

साल 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने में अहम् भूमिका निभाने वाले भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा कहते हैं कि 2003 का समझौता काफी पहले ख़त्म हो चुका है. सर्जिकल स्ट्राइक की जैसी कार्रवाई के बाद समझौते में कुछ बाकी नहीं रह जाता. News18 से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि वैसे भी ये समझौता कभी औपचारिक रूप से लागू हुआ ही नहीं था. ये सिर्फ बातचीत के स्तर पर ही था, एक प्रस्ताव रखा गया था जिसे मौखिक सहमति के आधार पर मान लिया गया था. उन्होंने आगे कहा कि 2013 में पाकिस्तान बॉर्डर एक्शन टीम (BAT) ने भारतीय जवानों के सिर काटने जैसी शर्मनाक हरक़त की थी ऐसे में पुराने समझौते पर कायम रहने की जगह नए समझौते पर काम होना चाहिए.
Article source: http://feedproxy.google.com/~r/ndtvkhabar/~3/hZj5K_jIHSw/story01.htm
No comments:
Post a Comment