READ MORE
(सुमित पाण्डेय)राजनीतिक तौर पर खत्म हो चुकी आरएलडी के लिए कैराना की जीत जीवदान जैसी है. 3 फरवरी को कैराना सीट से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद ही इस सीट पर उपचुनाव होना लगभग तय हो गया था. आरएलडी भी इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी और अपनी राजनीतिक वापसी के लिए अच्छा अवसर मान रही थी.
लेकिन यह सीट जीतना इतना आसान भी नहीं था, क्योंकि फूलपुर और गोरखपुर संसदीय सीट पर सपा-बसपा गठबंधन को सफलता मिलने के बाद इस बात की संभावना कम ही थी कि सपा-बसपा किसी और पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करे. बताया जाता है कि शुरुआत में सपा किसी हिंदू उम्मीदवार- जाट, गुर्जर या कश्यप को उतारना चाहती थी. उसका मानना था कि मुसलमान वोट इसमें जुड़कर पार्टी को जीत दिला देगा. लेकिन बाद में सपा ने ये सीट आरएलडी के लिए छोड़ दी क्योंकि उसे डर था कि वोट बंट जाने की वजह से वो हार सकती है.
ये भी पढ़ेंः उपचुनावों में हार पर कांग्रेस का तंज, कहा- BJP कैराना हारी है, 2019 में हिंदुस्तान हारेगीहालांकि अगर आरएलडी उम्मीदवार कैराना सीट नहीं जीत पाती तो सपा, फूलपुर और गोरखपुर संसदीय सीट पर अपनी जीत का हवाला देकर हार का सारा ठीकरा आरएलडी पर फोड़ देता. इसके अलावा कैराना उपचुनाव इस बात का भी टेस्ट था कि अगर 2019 लोकसभा चुनाव के लिए महागठबंधन बनता है तो अजीत सिंह उसके लिए कितने फायदेमंद साबित हो सकते हैं.
फिर मुसलमान उम्मीदवार को मैदान में उतारकर सांप्रदायिक दंगों के कारण जाट व मुस्लिम के बीच पड़ी दरार को खत्म करने की कोशिश भी की गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी सीटों पर जाट, जाटव व मुसलमान वोट काफी निर्णायक हैं. जबकि सहारनपुर व अलीगढ़ के कुछ इलाकों में कांग्रेस पार्टी का दबदबा है.
ये भी पढ़ेंः उपचुनाव: VVPAT में खराबी मामले की चुनाव आयोग ने शुरू की जांच
अगर कैराना उपचुनाव के ट्रेलर है तो निश्चित रूप से 2019 का चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है. लेकिन इन सबके बीच अजीत सिंह की पार्टी को एक बार फिर से जीवनदान मिल गया है और वो आने वाली दूसरी लड़ाई के लिए तैयार हो गए हैं.
Article source: http://feedproxy.google.com/~r/ndtvkhabar/~3/I9tI1Zl8f8k/story01.htm
No comments:
Post a Comment