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नई दिल्ली (राहुल मानव)। एनसीआर आसपास व हरियाणा और पंजाब के खेतों में किसानों द्वारा पराली जलाने से हर साल भयंकर प्रदूषण होता है। खेत में पराली जलाने पर सुप्रीम कोर्ट व एनजीटी बहुत पहले रोक लगा चुके हैं। पराली जलाने से रोकने के लिए सरकार ने भारी जुर्माने का प्रावधान किया है, बावजूद किसानों को खेत में पराली जलाने से रोकना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। अब यही पराली हमारे स्वास्थ्य के लाभदायक साबित होने वाली है।
पराली को फायदे का सौदा बनाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर देवेश बिरवाल ने कृषि अर्थशास्त्र पर शोध कर, पराली को जलाए बिना उससे निपटने का उपाय निकाला है। इससे किसानों को आर्थिक मदद भी मिलेगी। वह अगले माह से हरियाणा के गांवों में जाकर किसानों को पराली न जलाने और जैविक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को अपनाने के लिए जागरूक करेंगे। पराली से बनी जैविक खाद, फसलों के साथ हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होगी।

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चार साल तक पराली पर किए शोध में प्रो. देवेश बिरवाल ने गांवों में देखा कि अगर पराली पर 15 दिन के लिए पानी छोड़ दिया जाए तो वह सड़ने लगती है। फिर खाद में परिवर्तित हो जाती है। इसे नई फसलों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे बनी खाद को किसान बाजार में बेच भी सकते हैं। उन्होंने खेतों में कीटनाशक की जगह जैविक अपशिष्ट प्रणाली को अपनाने व गरीब किसानों के लिए रोजगार के अवसरों की संभावनाओं को लेकर भी शोध किया है। उन्होंने शोध के लिए चार वर्षों तक हरियाणा के गांवों में फील्ड स्टडी की। उनका शोध कृषि अर्थशास्त्र की भारतीय पत्रिका ‘इंडियन जर्नल ऑफ एग्रिकल्चरल इकोनॉमिक्स’ में अगस्त 2017 में छपा था।
कई किसान अपना रहे हैं जैविक अपशिष्ट प्रणाली

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प्रो. देवेश बिरवाल ने बताया कि हरियाणा के रेवाड़ी व करनाल के गांवों में शोध के दौरान उन्हें ऐसे 15 किसान मिले, जिन्होंने अपने घरों में जैविक अपशिष्ट प्लांट लगाए हैं। इससे वे कम लागत में फसल की उपज कर रहे हैं।
आमदनी बढ़ा रहे हैं गरीब किसान

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रेवाड़ी में शोध के दौरान में उन्होंने देखा कि बड़े और छोटे किसान एक-दूसरे के सहयोग से अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं। चूंकि बड़े किसानों के पास अधिक पशु होते हैं इसलिए इनकी देखभाल के लिए उन्हें लोगों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि बड़े किसान गाय व भैंस के बच्चों को तीन साल के लिए छोटे या गरीब किसानों को पालने के लिए दे देते हैं। इसके बाद जब इन पशुओं को बाजार में बेचा जाता है तो मिली रकम वे आपस में बांट लेते हैं। इसे कॉन्ट्रेक्चुअल फॉर्मिंग कहा जाता है। इसके लिए उन्हें डॉ. एनए मजूमदार अवॉर्ड से पुरस्कृत भी किया जा चुका है।
By Amit Singh
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