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विजयसिंह परमारअगर आप राजकोट में होते तो आप 63 साल के अशोक पटेल को जरूर जानते. बिना हेलमेट के स्कूटर पर चल रहे अशोक ने अपने गले में तख्ती लगा रखी है – ‘ये मेरा सिर है.’ अशोक हेलमेट को जरूरी
बनाने के कानून का विरोध कर रहे हैं.
2005 से, जब से गुजरात सरकार ने हेलमेट को जरूरी बनाया है तब से अशोक इस कानून के विरोध में असहयोग आंदोलन पर हैं. राजकोट में अशोक पटेल की बंगाली मिठाइयों की दो दुकानें हैं. अपने बेटे को बिजनेस सौंप कर वे हेलमेट के विरोध में एक फुल टाइम एक्टिविस्ट बन गए हैं.ये भी पढें: सामूहिक विवाह में 7 जोड़ों ने हेलमेट पहन की शादी, सात की जगह लिए 8 फेरे!
2005 में जब हेलमेट को अनिवार्य करने का कानून हाई कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद से लाया गया तभी से से अशोक इसका विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है, “एक बार 2005 में जब मैं बिना हेलमेट के चला जा रहा था तब पुलिस ने रोक कर मुझ पर फाइन किया. मैंने फाइन देने से मना कर दिया. मुझे कोर्ट ले जाया गया वहां भी मैंने इनकार कर दिया. मुझे फिर पांच दिन के लिए कोर्ट की अवमानना के आरोप में जेल भेजा गया.’
फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले अशोक अपने इस अभियान को महात्मा गांधी का हवाला देते हैं. उनका कहना है, “गांधी जी कहते हैं कि जो कानून तर्कसम्मत नहीं है वो अपने आप में हिंसा है. इसके लिए
गिरफ्तार किया जा सकता है. अहिंसा के कानून के मुताबिक हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं बल्कि अहिंसा से ही दिया जा सकता है. मैं भी यही करता हूं. शांतिपूर्वक कानून तोड़ता हूं और फिर जेल भेज दिया जाता
हूं.”

अशोक पटेल अपने अभियान पर
वे ये भी कहते हैं कि क्या सरकार ये गारंटी दे सकती है कि जो आदमी हेलमेट पहने है वो मरेगा नहीं. बहुत सारे लोग खराब सड़कों के कारण होने वाले एक्सीडेंट से मारे जाते हैं. फिर वाहनों के चलने के लायक
सड़के क्यों नहीं बनवाती सरकार.
उनका दावा है कि हेलमेट बनाने वालों के सिंडिकेट और कुछ तकतवर लोग इस कानून के पीछे हैं. इससे भी बढ़कर बाजार में बिक रहे हेलमेट न तो पूरी तरह से सेफ हैं और न ही जीवन की हिफाजत करने की
गारंटी देने वाले हैं. इसलिए मैं अपना विरोध जारी रखूंगा चाहे जितनी बार भी मुझे जेल भेजा जाय. उनके गले में एक और तख्ती है, जिसपर लिखा है, “अगर कोई डर गया तो दूसरे उसे और दबाते हैं.”
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