Thursday, 30 August 2018

गुजरात: सूचना आयोग ने RTI पर पलट दिया कोर्ट का फैसला


READ MORE

विजयसिंह परमारगुजरात के जूनागढ़ में जिला न्यायालय ने एक रिटायर्ड क्लर्क को इसलिए दंड दे दिया क्योंकि उसने सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत जानकारी मांगी थी. जबकि भग्नेश जानी नाम के इस क्लर्क को वो सूचनाएं भी नहीं दी गईं जो उसने मांगी थी. हालांकि गुजरात के सूचना आयोग (जीआईसी) ने जानी की अपील पर उसकी मदद की. सूचना आयोग ने कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया.


सूचना आयोग को लगा कि अपील करने वाले जानी के मामले में दूसरे पक्ष यानी कोर्ट का व्यवहार सही और जिम्मेदार नहीं था. अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश, जो आरटीआई के लिए अपीलीय अधिकारी भी हैं, उन्होंने आरटीआई आवेदक को नकल की फीस के तौर पर 74 रुपये के साथ दंड भी लगा दिया था. उनकी इस कार्रवाई को सूचना आयोग ने पूरी तरह से सूचना कानूनों के विरुद्ध माना.


ये भी पढ़े : सूचना आयोग की सूचना कौन देगा? CIC के पास नहीं कोई डिटेलसूचना आयोग ने अपीलीय अधिकारी यानी अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश(एडीजी) नकल की फीस 74 रुपये और 1000 रुपये के दंड को जानी को 15 दिन के भीतर वापस लौटा कर सूचना आयोग को सूचित करने के आदेश भी दिए.


जूनागढ़ जिला न्यायालय से संतोषजनक जवाब न मिलने पर शहर के ही एक निवासी भग्नेश जानी ने 3 जून 2016 को गुजरात के सूचना आयोग के यहां अपील दायर की थी.


मार्च 2016 में भग्नेश जानी ने आरटीआई आवेदन करके जूनागढ़ जिला सत्र न्यायालय में काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में जानकारी मांगी थी. बहरहाल, जनसूचना अधिकारी (प्रमुख वरिष्ठ सिविल जज) ने ये कह कर सूचना देने से मना कर दिया था कि मांगी गई जानकारी को आरटीआई प्रावधानों के तहत छूट मिली हुई है. इसके बाद भग्नेश जानी ने अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायालय जो कि अपीलीय अधिकारी हैं, उनके पास अप्रैल 2016 में अपील दायर की. जानी ने वहां दलील दी कि मांगी गई सूचना संबंधित कार्यालय में है और उसे किसी तरह से प्रावधानों के तहत छूट नहीं मिली है.


इस पर प्रथम अपीलीय अधिकारी यानी एडीजे ने ये पाया कि आरटीआई के तहत इस तरह से जानकारी मांगी गई है जैसे वो कोई जांच अधिकारी हो और कोर्ट दोषी. तबादला प्रोन्नति जैसी जानकारियां किसी अन्य को नहीं दी जा सकतीं. चूंकि उन्होंने कोर्ट का समय नष्ट किया. पहली नजर में सूचना मांगने वाले की नीयत ईमानदार होनी चाहिए और सूचना उससे जुड़ी होनी चाहिए.


अपीलीय अधिकारी ने मई 2016 तक के लिए सुनवाई टाल रोक दी. साथ ही भग्नेश जानी को आरटीआई एक्ट के दुरुपयोग का दोषी मानते हुए उन पर 1000 रुपये का जुर्माना ठोक दिया. कोर्ट ने उनसे कहा कि वे ये रकम जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करें. साथ ही ये भी व्यवस्था दी कि अगर अपील करने वाला 1000 रुपया जमा करने में विफल रहता है तो ये राशि उसकी पेंशन से काट ली जाए.


इस फैसले से नाखुश भग्नेश ने सूचना आयोग में दूसरी अपील दायर कर मांग की उन पर लगाया गया जुर्माना वापस लिया जाए और मांगी गई जानकारी मुफ्त में दी जाय.


सूचना आयोग ने 30 जुलाई को अपने फैसले में ये भी व्यवस्था दी कि सूचना कानूनों में या गुजरात सरकार के नियमों या फिर गुजरात हाई कोर्ट की ओर से प्रथम अपीलीय अधिकारी को इसके लिए अधिकृत नहीं किया गया है कि वो सूचना मांगने वाले पर अर्थ दंड लगा सके. जबकि उससे पहली नकल के लिए 74 रुपये और दंड के तौर पर 1000 रुपये जमा करने को कहा गया.


जूनागढ़ के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जो अपीलीय अधिकारी हैं, उनके आदेश को दरकिनार करके सूचना आयोग ने कार्यालय के जन सूचना अधिकारी को निर्देश दिया कि अगर सूचना रिकॉर्ड में है तो आदेश मिलने के 20 दिनों के भीतर मांगी गई सूचना मुफ्त में दे कर आयोग को भी सूचित करें.


भग्नेश जानी का कहना है-“कोर्ट में आरटीआ की याचिका दायर करने के बाद से मैं बहुत अधिक मानसिक दबाव में आ गया था. मैने जानकारी मांग कर कोई नियम नहीं तोड़ा था, फिर भी कोर्ट ने बदले की भावना जैसा काम किया और मुझे दंड भी दे दिया.”

No comments:

Post a Comment