Saturday, 27 October 2018

15 मई 1999ः जब 'विदेशी' मूल की सोनिया के विरोध में कांग्रेस से अलग हुए थे तारीक अनवर


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(रशीद किदवई)तारीक़ अनवर के लिए 15 मई 1999 से लेकर अब तक का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ावा भरा रहा है. 19 साल पहले तारीक़ अनवर ने विदेशी मूल की सोनिया गांधी के विरोध में कांग्रेस छोड़ दी थी. उन्होंने शरद पवार के साथ मिलकर एनसीपी का गठन किया था. उस वक्त पीए संगमा भी कांग्रेस से अलग हो गए थे.


वैसे सच्‍चाई ये भी है कि अनवर ने पवार या संगमा के करीबी होने के कारण कांग्रेस नहीं छोड़ी थी, बल्कि सीताराम केसरी के साथ सोनिया ने जिस तरह का बर्ताव किया था, उससे अनवर आहत थे और वह सोनिया को तगड़ा झटका देना चाहते थे. एक साल पहले ही सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया था. पवार उन दिनों अनवर को सीताराम केसरी का आदमी कह कर तंज कसते थे. वो कहते थे, ”तीन म्यान, एक मीरा”. मुख्य तौर पर उनका इशारा तीन मुस्लिम- तारीक़ अनवर, गुलाम नबी आज़ाद और अहमद पटेल पर था.


तारीक़ अनवर अब राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. आईए एक नज़र डालते हैं उस घटनाक्रम पर जिसके बाद अनवर, पवार और संगमा ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध किया था.15 मई 1999 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी के ज़्यादातर सदस्य वर्ल्ड कप में टीम इंडिया के पहले मैच का इंतज़ार कर रहे थे. शाम को CWC की बैठक होने वाली थी जहां गोवा चुनाव के उम्मीदवारों की घोषणा, चुनाव गठबंधन और राजीव गांधी मर्डर केस पर चर्चा होनी थी. ज़्यादातर सदस्य बैठक जल्दी खत्म कर टीवी पर मैच देखना चाहते थे. इसी बैठक में पवार और संगमा की तरफ से विरोध के स्वर उभरने लगे.


संगमा ने बैठक में कहा कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बीजेपी लगातार उठा रही है जिसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पड़ सकता है. संगमा ने सोनिया से कहा, “हमलोग आपको और आपके माता-पिता के बारे में काफी कम जानते हैं.”


उस वक्त बैठक में मौजूद लोगों के मुताबिक संगमा के इस सवाल को सुनकर सोनिया गांधी हैरान हो गई. संगमा को खुद सोनिया ने CWC में नोमिनेट किया था. सीताराम केसरी के हटने के बावजूद तारीक़ अनवर भी सोनिया गांधी की वजह से CWC में बने हुए थे.


इसके बाद शरद पवार ने कमान संभाली. उन्होंने मुस्कुराते हुए सोनिया की तारीफ की और कहा, ”आपने पार्टी में एकता लाई और संगठन को फिर से बदल दिया. लेकिन कांग्रेस आपके विदेशी मूल के बारे में बीजेपी को जवाब नहीं दे सकी है. इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है.”


एक बार फिर से संगमा ने कहा, “जब लोग हमसे पूछते हैं कि क्यों कांग्रेस अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में 980 मिलियन नागरिकों के बीच एक योग्य भारतीय पाने में विफल रही है, तो हमारे पास कोई जवाब नहीं रहता है. मुझे लगता है कि वे सही हैं.”


संगमा के भाषण के बाद राजेश पायलट ने पवार और संगमा की बातों को सही ठहराने की कोशिश की. हालांकि, पायलट विद्रोही की तरह नहीं दिखे. इस बीच आरके धवन गुस्सा हो गए. उन्होंने शरद-संगमा की बातों की सीरे से खारीज कर दिया और कहा, “भाई, आप बीजेपी-आरएसएस का एजेंडा उठा रहे हैं.”


इस बीच सोनिया गांधी कमरे से निकर कर बाहर जाने लगी. गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, मोहसिना किदवई, के करुणाकरन, विजय भास्कर रेड्डी, जितेंद्र प्रसाद और सीताराम केसरी असहज दिख रहे थे. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना है. इस बीच अर्जुन सिंह अचानक उठकर सोनिया के पीछे भागे. उन्होंने जूते भी नहीं पहने थे.


नंगे पैर अर्जुन सिंह ने हाथ जोड़ते हुए सोनिया को वापस आने के लिए कहा. वहां मौजूद CWC के सदस्यों ने कहा कि इस घटना ने 1977 की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी को जगजीवन राम ने ये कहते हुए चुनौती दी थी कि पार्टी और लोगों ने उनसे विश्वास खो दिया है.


हालांकि सोनिया को खुद के बारे में कोई भ्रम नहीं था. जब कुछ CWC सदस्यों ने उनसे इंदिरा की तरह लड़ने के लिए कहा, सोनिया ने जवाब दिया, “मैं जवाहरलाल नेहरू की बेटी नहीं हूं!”


सोनिया वहां से चली गईं. पवार और संगमा निराश थे. उन्होंने प्रणब मुखर्जी से कहा कि ये उनकी आखिरी CWC की बैठक थी. बैठक के ठीक बाद, जब मुखर्जी, माधवराव सिंधिया और दूसरे लोग गोवा के लिए नामांकितों की सूची पर बात कर रहे थे तभी सोनिया को उनके खिलाफ आरोपपत्र की तरह चिट्ठी मिली. सोनिया ने इसे पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसके बाद विन्सेंट जॉर्ज ने अर्जुन सिंह, मुखर्जी और डॉ मनमोहन सिंह सहित वरिष्ठ नेताओं को इस चिट्ठी पर बातचीत के लिए बुलाया.


अर्जुन सिंह बेहद गुस्से में थे उन्होंने कहा कि 1985 में पवार को पार्टी में वापस लाने के लिए उन्होंने राजीव गांधी से उनकी पैरवी की थी.


पवार के आलोचकों ने बताया कि राजीव की मौत के कुछ ही समय बाद उन्होंने सोनिया गांधी से पार्टी का प्रभार संभालने की मांग की थी. उन्होंने तब ऐसा करने से इनकार कर दिया था.


दरअसल विदेशी मुद्दे पर सोनिया पर निशाना साधने से कुछ दिन पहले ही पवार को वाजपेयी सरकार के पतन के तुरंत बाद संभावित सहयोगियों से सहयोग लेने की अहम ज़िम्मेदारी दी गई थी. उस पत्र में ये स्पष्ट लिखा था कि सोनिया प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगी. पवार को अन्य राज्यों में गठजोड़ करने के महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था.


सोनिया गांधी ये अच्छी तरह जानती थी कि पवार एक अच्छे नेता ज़रूर हैं लेकिन विश्वास योग्य नहीं. मई 1999 में पवार 58 साल के थे और पूरी तरह से जानते थे कि अगर सोनिया ने कमान संभाली तो फिर उनके प्रधनमंत्री बनने की संभावनाएं पूरी तरह खत्म हो जाएगी.


पवार को लगा कि 13वीं लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और समता पार्टी के नेता जॉर्ज फर्नांडीस को पवार का करीबी सहयोगी कहा जाता था, जिन्होंने उनके लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदें जगाई थी. उनका तर्क था कि जब तक सोनिया गांधी कांग्रेस प्रमुख रहेंगी तब तक चंद्रबाबू नायडू, मायावती, मुलायम सिंह यादव, ममता जैसे क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस का समर्थन नहीं करेगी.


ऐसे में पवार को लगा कि वो गठवंधन की सरकार को चला सकते हैं. 1999 के चुनाव में बीजेपी और उनके सहयोगी दलों की जीत हुई. अपने घर महाराष्ट्र में पवार की पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर रही.


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनकी निजी राय हैं)


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