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(आकाश हसन)सबीना और याकूब पिछले एक महीने में कारगिल की चोटी से सांबा के मैदानी इलाकों तक कई सौ किलोमीटर पैदल चल चुके हैं. अब उनका घर सिर्फ 25 किलोमीटर दूर है. लेकिन इस छोटी सी दूरी को पार करने की उनकी हिम्मत नहीं हो रही है.
सबीना और याकूब रासना में पिछले एक हफ्ते से आगे बढ़ने का इंतज़ार कर रहे हैं. ये दोनों उस जगह वापस जा रहे हैं जहां 10 महीने पहले उनकी 8 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप किया गया और उसे मौत के घाट उतार दिया गया.
जम्मू-कश्मीर पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, अल्पसंख्यक खानाबदोश समुदाय की आठ साल की बच्ची का अपहरण 10 जनवरी को किया गया और कठुआ जिले के एक गांव के मंदिर में बंदी बनाकर उसका रेप किया गया. बाद में उसकी हत्या कर दी गई.सबीना और याकूब अपने घर रासना में लौटने से डर रहे हैं. उन्हें याद है कि अपनी मृत बेटी को दफनाने के लिए किस तरह उन्हें दर-दर भटकना पड़ा था. ये दोनों कई गांव गए लेकिन किसी ने भी इन्हें दफनाने के लिए जगह नहीं दी. आखिरकार सात किलोमीटर दूर जा कर इन्हें अपनी बेटी को दफनाना पड़ा था.
गांव पहुंचने से पहले इन्हीं धमकी दी जा रही है. इनकी बेटी के साथ जो कुछ भी हुआ उसके लिए इन दोनों को ही ज़िम्मेदार ठहाराया जा रहा है.
सबीना ने बताया, ”कुछ लोगों ने हमें यहां देख लिया था. हमें गांव से बाहर निकालने की धमकी दी जा रही है. हमसे कहा जा रहा है कि हमारे चलते ही कुछ लोगों को जेल जाना पड़ा.” ऐसे में सबीना और याकूब बेहद डरे हुए हैं. पास के झरने से पानी लाने में भी इन्हें डर लगता है.
इन दोनों ने तमाम मुश्किलों के बावजूद हिम्मत नहीं हारी है. अपनी बच्ची के लिए ये कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. याकूब को कारगिल से पठानकोट के 530 किलोमीटर के लंबे रास्ते के दौरान खर्चे के लिए कई भेड़ और बकरियां बेचनी पड़ीं. उन्होंने कहा, ”मुझे तीन से चार बार कोर्ट जाना पड़ा. मैंने खर्चों के लिए कुछ भेड़ और बकरी बेच दी. मैं अपनी बच्ची को न्याय दिलाने के लिए सारी संपत्ति बेच दूंगा.”
सबीना चाहती है कि हत्यारे को फांसी की सज़ा मिले. लेकिन उन्हें इस बात का भी डर लग रहा है कि अगर दोषी को फांसी की सज़ा मिलती है तो फिर उनकी जान को भी खतरा है. उन्होंने कहा, ”हम सबको मार दिया जाएगा.”
अगर इन दोनों के पास कोई विकल्प होता तो ये यहां वापस नहीं आते. यहां आने से पहले जमीन की तलाश की लेकिन उन्हें नहीं खरीद सके. दोनों यहां अकेले हैं, अपने बच्चों को डर से अपने रिश्तेदारों के पास छोड़ दिया है.
सबीना और याकूब के जीवन में कई बार आफत आई है. लेकिन हर बार उन्होंने वापसी की है. मार्च 2012 में एक सड़क दुर्घटना ने इनके परिवार के चार सदस्यों की मौत हो गई. जिसमें तीन छोटे बच्चों और याकूब की मां शामिल थी.
सबीना और याकूब का कहना है कि उन्हें किसी तरह का अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है. अप्रैल में, जम्मू-कश्मीर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण ने परिवार को 2 लाख रुपये के मुआवजे को मंजूरी दे दी. लेकिन याकूब कहते हैं कि कहते हैं, “हमें एक पैसा नहीं मिला है.”
उसके पास 200 बकरियां और भेड़ें हैं, और 14 घोड़े हैं. रसाना में उनके पास एक छोटा सा घर है. उनके पास करीब दो एकड़ एकड़ ज़मीन भी है. वे पिछले कई दशकों से उस घर में रह रहे थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें परेशान किया है.
याकूब ने कहा, “वे अक्सर बकरवाल लड़कों को मारते थे. वे हमें गालियां देते थे. लेकिन हमने इन चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे. हमने सोचा था कि ये चीजें होती रहती हैं. पीने के पानी तक के लिए हमें गांववालों के भरोसे रहना पड़ता है.गांव में एक कुआं है जो उनके नियंत्रण में है. अब हमें वहां से पीने के पानी के लिए परमिशन लेनी पड़ती है.”
उनका कहना है कि अगर वो अपना घर बेचना भी चाहे तो भी नहीं बिकेगा. उन्होंने कहा, ”बहुसंख्यक समुदाय चाहते हैं कि हम यहां से बाहर रहें. लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई भी बकरवाल हमारी ज़मीन खरीदने की हिम्मत करेगा.”
याकूब और उनकी पत्नी अगले दो हफ्ते तक अपने घर से 25 किमी दूर इसी जगह रहेंगे. अगर गांव में कोई समाधान हुआ तो फिर वो आगे बढ़ेंगे. सर्दियों के बाद याकूब और उसका परिवार एक बार फिर से पहाड़ों की तरफ लौट जाएगा.
(पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)
(लेखक कश्मीर के स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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Article source: https://hindi.news18.com/news/nation/hyderabad-ram-mandir-babri-masjid-shree-shree-ravishankar-board-all-india-muslim-personal-law-board-1265651.html
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