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(सुदीप श्रीवास्तव) छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद यह राज्य बीजेपी के लिए अनुकूल राजनीतिक इलाका बन गया है. जनजातीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा और एसटी के लिए आरक्षित 34 विधानसभा सीटें छत्तीसगढ़ के हिस्से में गईं, जिसका मतलब ये है कि मध्यप्रदेश अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के प्रभुत्व वाला राज्य है. सहज रूप से 2000 के बाद नियुक्त बीजेपी के तीनों मुख्यमंत्री- उमा भारती, बाबुलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान, ओबीसी समुदाय से आते हैं.
कांग्रेस राज्य में एक भी मजबूत ओबीसी नेता को पेश नहीं कर सकी. ऐतिहासिक रूप से मध्य प्रदेश में 1956 से ही कांग्रेस के नेता या तो ब्राह्मण थे या सामंती वर्ग से संबंधित थे.
क्षेत्रवार तरीके से महाकौशल और बाघेलखण्ड में अधिक जनाजतीय आबादी रहती है और पिछले चुनाव में यहां गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया था. बुंदेलखण्ड और चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में बीएसपी की महत्वपूर्ण उपस्थिति है, जबकि उत्तर प्रदेश से की सीमा से जुड़े हुए कुछ क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी का प्रभाव है. मालवा और भोपाल क्षेत्रों में बीजेपी और कांग्रेस का प्रभुत्व है.कुछ छोटे संगठनों ने भी चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारा है जो बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. एससी/एसटी एक्ट को लेकर बीजेपी को राज्य में सवर्णों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है. एक उच्च जाति समूह SAPAKS (सामान्य पिछड़ा अल्पसंख्यक कल्याण संस्था) ने चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे हैं जो बीजेपी के सवर्ण वोटों को काट सकते हैं. एससी/एसटी एक्ट के विवाद को लेकर सवर्ण और ओबीसी जातियों के एक वर्ग की कांग्रेस की तरफ झुकने की भी संभावना है.
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जब बात सड़कों और इंफ्रास्ट्रक्चर की आती है तो मध्यप्रदेश में इन दोनों का ही विकास नजर आता है, लेकिन इस बार का मध्य प्रदेश चुनाव किसानों की समस्या के ऊपर लड़ा जा रहा है. राज्य में खेती पर निर्भर लोगों की बड़ी संख्या है और अधिकतर जमीन मालिक उच्च जातियों और ओबीसी से संबद्ध हैं.
मुख्यंत्री के तौर पर अपने पहले दो कार्यकाल में शिवराज सिंह चौहान ने कृषि क्षेत्र पर खास ध्यान दिया, इसी का परिणाम था कि कृषि में राज्य में दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि उनका तीसरा कार्यकाल स्थिर नहीं रहा. 2014 के बाद किसानों की नाराजगी शुरू हुई और बीजेपी के खिलाफ नकारात्मक भावनाओं को जन्म हुआ.
नोटबंदी ने किसानों के लिए नगदी का संकट पैदा किया. इसके अतिरिक्त मनरेगा और भवंतरी योजना के आवंटन में कटौती ने किसानों एवं सरकार दोनों के लिए चीजों को मुश्किल बना दिया. पूरे राज्य में किसानों ने आत्महत्या की और मंदसौर में किसानों पर गोली चलाने की घटना ने किसानों का गुस्सा बढ़ा दिया.
एक और मुद्दा जिसने बीजेपी के लिए मुसीबत खड़ी की है वह है व्यापम घोटाला. इसने राज्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया, क्योंकि इस घोटाले में उनके कई नेताओं को आरोपी बनाया गया है.
बीजेपी के 15 सालों के शासन के बाद शिवराज सिंह चौहान एंटी इनकंबेंसी से लड़ रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस के पास जमीनी संगठन और गुटबाजी का अभाव दिख रहा है. राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए पैसे की कमी और सीएम का चेहरा न होना भी चिंता का कारण है. कांग्रेस चुनाव जीतने के बाद ऋण माफी एवं एमएसपी देने के वायदे पर चुनाव लड़ रही है.
सभी परेशानियों के बावजूद शिवराज सिंह चौहान का आज भी मध्य प्रदेश में पर्याप्त बोलबाला है. बीजेपी का कैंपेन ‘माफ करो महाराज, हमारा नेता तो शिवराज’ दिखाता है कि पार्टी किस तरह जीत के लिए तीन बार के मुख्यमंत्री का बचाव कर रही है. कांग्रेस भी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भरोसा कर रही है, लेकिन पार्टी अपने सितारों पर उतना निर्भर नहीं है जितना कि बीजेपी चौहान पर है.
नवंबर 28 को मतदाता राज्य में अगली सरकार बनाने के लिए वोट डालेंगे, ये अनिश्चित मतदाता हैं जो निश्चित करेंग कि राज्य में अगले 5 साल कौन सत्ता में रहेगा.
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