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‘हमारा तो बचपन यहीं गुज़रा है, यहीं जन्म हुआ है. यहां बालिका गृह है पता था, लड़कियों की जेल है, ये पता था, लेकिन ये सब चल रहा है, ये नहीं पता था.’ ऐसा कहना मुजफ्फरपुर के बालिका गृह के पास रहने वाली लिली (बदला हुआ नाम) का है. लिली कहती हैं कि जब से उन्हें और उनके परिवार को पड़ोस में हुई इस घटना के बारे में पता चला है वह सब सकते में हैं.लिली के मुताबिक – ‘इतने वक्त से यहां रह रहे हैं कभी पता नहीं चला. इतना भी जानते हैं कि वो (ब्रजेश ठाकुर) इंसान वैसे नहीं थे. हम यहीं बड़े हुए हैं, अंदर तो कभी नहीं गए लेकिन वहां बाहर बरामदे में हम खेलते थे, कूदते थे, ऐसा हमारे साथ कभी नहीं हुआ.’
लिली की ही तरह वहां रहने वाले किशन कुमार (नाम बदला हुआ) का भी ऐसा ही कुछ कहना है. इन पड़ोसियों की बातों में डर से ज्यादा एक अचंभा दिखाई देता है. अचंभा इस बात का कि एक छोटे से कस्बे की संकरी सी गली में इतनी बड़ी वारदात हो गई लेकिन किसी को कानों कान ख़बर नहीं लगी. इसके अलावा पड़ोसियों के साथ बातचीत बताती है कि इस मामले में अहम आरोपी ब्रजेश ठाकुर – जो इस बालिका गृह के संस्थापक भी हैं – की एक अलग तरह की छवि थी. एक ऐसे व्यक्ति की छवि जो प्रभावशाली है, दबंग है लेकिन जरूरत पड़ने पर अपने पड़ोसियों और कस्बे वालों के काम भी आता है.
लेकिन कुछ लोग हैं जिन्होंने ब्रजेश ठाकुर के खिलाफ बयान दिए हैं. कोर्ट में गवाह बने तीन पड़ोसियों ने कुछ और ही बात कही है. साबिरा (बदला हुआ नाम) का घर बालिका गृह से सटा हुआ है और उनका बयान है कि ब्रजेश ठाकुर काफी दबंग प्रवृत्ति के हैं. उन्होंने बताया कि लड़कियां तीसरे माले पर रहती थीं. जिस कमरे में बच्चियां रहती थीं, उसमें खिड़की न होकर वेंटिलेटर जैसा कुछ शीशा लगा दिखता था. कभी कभार लड़कियों के चीखने चिल्लाने की आवाज़ आती थी लेकिन ठाकुर की प्रवृत्ति देखकर कभी कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. अमित और नीरज (बदले हुए नाम) ने भी अपने अपने बयानों में बताया कि बच्चियों की चीख अजीब किस्म की होती थी. उनकी चिल्लाहट के संबंध में अपने परिवार में भी चर्चा करते थे लेकिन ठाकुर की दबंगई की वजह से कोई हिम्मत नहीं कर पाता था.इसमें कोई शक नहीं कि ब्रजेश ठाकुर का इलाके में दबदबा है. कोर्ट की रिपोर्ट भी मानती है कि ठाकुर का राजनीतिक, प्रशासनिक, गुंडा, पुलिस महकमा समेत अन्य क्षेत्रों में काफी पैठ और पहुंच है. ब्रजेश प्रात: कमल, न्यूज़ नेक्स्ट नाम के अखबार चलाते हैं. अल्पावास गृह के अलावा वृद्धाश्रम, आदर्श महिला केंद्र, स्वाधार गृह, आदर्श महिला शिल्प कला केंद्र जैसे अलग अलग संगठन भी चलाते हैं. ऐसे में बालिका गृह में होने वाली गतिविधियों के बारे में आसपास के लोगों का चुप्पी साधे रखना समझा जा सकता है.
जहां तक पड़ोसियों की लड़कियों से होने वाली बातचीत का सवाल है तो लिली बताती हैं – बालिका गृह की लड़कियां अंदर ही रहती थी. बाहर का कोई अंदर नहीं जाता था. लड़कियों को जब लाया जाता था तो वो उनके घर के सामने से ही जाती थी लेकिन सबका मुंह ढंका हुआ रहता था. लिली कहती हैं उनकी(ब्रजेश ठाकुर) बाहर इतनी अच्छी छवि है, अभी भी यकीन नहीं होता लेकिन लड़कियों के बयान से लगता है कि बिना चिंगारी के तो आग नहीं लगती है ना.
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