Wednesday, 3 October 2018

क्या सलीम आतंकवादी था? फोर्स के ‘आॅपरेशन’ को लोग क्यों कह रहे हैं हत्या?


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‘या अल्लाह, आज क्या क़यामत होने वाली है?’… ‘श्श्श्श.. घर की सारी लाइटें बंद कर दो.’ रात के करीब दो बज रहे थे और कश्मीर के श्रीनगर के नूरबाग इलाके में लोग डर के मारे अपने घरों के दरवाज़े, खिड़कियां और बत्तियां बुझाकर दुबक रहे थे. इस डर की वजह थी कुछ ही देर में होने वाली कोई अनहोनी. आर्म्ड फोर्सेस यानी हथियारबंद सुरक्षा दस्ते पूरे इलाके की घेराबंदी कर चुके थे और उस रात किसी को नहीं पता था कि क्या होने वाला है.खौफ़ का ये माहौल इस इलाके के लिए क्या कश्मीर के किसी भी हिस्से के लिए नया नहीं था. लेकिन इस खौफ में बहुत से अंदेशे शामिल थे क्योंकि किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि उस रात अचानक ये घेराबंदी क्यों? पिछले कुछ दिनों में किसी ने उस इलाके में दहशतगर्दी यानी आतंकवाद संबंधी किसी हालिया मूवमेंट के बारे में नहीं सुना था इसलिए यह दबिश उस इलाके के लोगों को खौफज़दा कर रही थी.


आर्म्ड फोर्सेस की तकरीबन 30 गाड़ियों और जवानों के बूटों की आवाज़ों से पूरा इलाका थर्रा चुका था. इसके बाद एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी एक मकान में अपने परिवार के साथ दुबके हुए फ़याज़ को ऐसा लगा जैसे उसका नाम दो तीन बार पुकारा गया. फिर उसके मकान की दीवार पर कुछ गोलियां चलने की आवाज़ उसे सुनाई दी. पास के ही एक मकान से एक औरत ने बाहर झांका तो उसे फोर्सेस दिखाई दीं. इतने में ही उस औरत का शौहर दरवाज़े पर आया और उसे अंदर जाने को कहा.


इस आदमी को देखकर आर्म्ड फोर्सेस के एक अफसर ने कड़क आवाज़ में उसका नाम पूछा. ‘मैं याक़ूब हुज़ूर.’ नाम सुनते ही उस अफसर ने याक़ूब का गिरेबान पकड़ा और उसे बाहर लाकर अपने एक और अफसर से कहा ‘मिल गया जनाब’. अब याक़ूब ने घबराते हुए पूछा कि मामला क्या है तो उस अफसर ने उसे और उसके परिवार पर दहशतगर्द होने का शक ज़ाहिर किया. याक़ूब ने मना किया तो उससे उसका पूरा नाम और उसकी फैमिली के नाम पूछे गए और फिर फोर्सेस को यकीन हुआ कि ये वो नहीं है.


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श्रीनगर का नूरबाग इलाका. गूगल मैप.

‘हमें याक़ूब मलिक का मकान बताओ.’ आर्म्ड फोर्सेस ने याक़ूब से जब ये कहा तो उसने उंगली के इशारे से एक मकान की तरफ इशारा किया. फोर्सेस ने एक अफसर के इशारे पर उस मकान को घेरना शुरू किया. लेकिन उस मकान का मंज़र तो कुछ और ही था. कुछ जानवर थे, भेड़ें, बकरियां, कबूतर वगैरह. मकान के बाहरी दालान में इन जानवरों को रखा गया था और वहां इनके लिए चारा और दाने वगैरह भी पड़े थे.


इससे कुछ पहले याक़ूब ने अफसरों से पूछा था कि ये सब क्या हो रहा है तो फोर्सेस ने बताया था कि इस इलाके में दहशतगर्दों के मूवमेंट की खबर है. याक़ूब ने उनसे गुज़ारिश की थी कि वो इलाके में ज़्यादातर लोगों को जानता है इसलिए वह हर घर में जाकर पूछताछ कर उनकी मदद कर सकता है. अफसरों के कहने पर याक़ूब ने अपने परिवार को महफूज़ रहने की हिदायत देते हुए मोहल्ले के घरों की तरफ रुख कर लिया था.


इधर, अपने जानवर सलीम को अपनी जान से प्यारे थे. कबूतरों को दाना देने वाले, भेड़ों को चराने वाले सलीम को लोग इस तरह जानते थे कि बड़ा नेक लड़का है. बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करता है और बहुत कम बातचीत करता है. बस अपने जानवरों के दोस्ताने में ही गुम रहता है. उस रात जब सलीम के मकान को घेरा जा रहा था तभी जानवरों के बाड़े से भेड़ों के मिमियाने और कबूतरों के फड़फड़ाने का शोर सा उठा. घर के भीतर दुबके सलीम को ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई उसके जानवरों को सता रहा है या भगाने की कोशिश कर रहा है.


सलीम अपने जानवरों की हिफाज़त के लिए घर से बाहर दौड़ा. इस बात से बेखबर कि घर के बाहर अस्ल में माजरा क्या था? सलीम जैसे ही बाड़े के पास दौड़ता हुआ आया, हर तरफ से उस पर तड़ातड़ गोलियों की बौछार शुरू हो गई. तकरीबन 50 राउंड फायरिंग के बाद दर्जनों गोलियों से लहूलुहान हो चुका सलीम लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा. फड़फड़ाते हुए कबूतर इधर उधर उड़ने लगे और भेड़ों के मिमियाने की आवाज़ें कराहती हुई सी महसूस होने लगीं.


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फायरिंग की आवाज़ों से सलीम के परिवार को लगा कि आर्म्ड फोर्सेस ने आतंकवादियों पर हमला किया होगा इसलिए वो घर में रहे. पिछली रात क्रिकेट मैच देखने के बाद सलीम और उसके पिता ने सुबह जल्दी उठकर नमाज़ भी पढ़ी थी. फिर सलीम चला गया था. उधर, पूछताछ में जुटे याक़ूब ने फायरिंग की आवाज़ें सुनीं तो वापस वहीं लौटने का रुख किया. इतने में इलाके का ही एक और शख्स शब्बीर वहां पहुंचा. शब्बीर ने फोर्सेस के लोगों को कहते सुना – ‘दो तो भाग गए लेकिन हमने एक को मार गिराया.’ शब्बीर ने पूरा मंज़र देखकर सवाल किया तो उसे हिरासत में ले लिया गया.


एक अफसर ने शब्बीर से पूछा – ‘तुम यहीं रहते हो? इस लाश को पहचान कर बताओ कि ये कौन सा कमांडर था? इसका नाम क्या था?’ शब्बीर ने देखा तो लाश औंधे मुंह पड़ी थी और उसके एक पैर में स्लीपर चप्पल थी, दूसरी कुछ दूर पड़ी हुई थी. उसके जिस्म पर वही कपड़े थे जो इलाके के आम लोग पहनते थे. शब्बीर ने जब लाश का चेहरा न दिखने की बात की तो टॉर्च की रोशनी में करीब से उसको दिखाकर फिर पूछा गया. शब्बीर ने हैरानी से कहा – ‘जनाब, ये तो यहीं का लड़का है, कश्मीरी है, बेगुनाह है.’


शब्बीर की यह बात अफसर को गवारा नहीं थी. शब्बीर को पीटा गया और उससे बार बार पूछा गया कि ये लाश किसकी थी.


हमने किसको ठोका? बोल, सच उगलवाना हमें आता है. तू ऐसे नहीं बताएगा तो पिट-पिटकर बताएगा. बता ये यहां कबसे था? इसने हथियार कहां छुपाकर रखे हैं? इसे कबसे यहां पनाह दी जा रही थी? बोल, सच बोल वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.


शब्बीर यही कहता रहा कि ये सलीम है जो ट्रक चलाने वाले याकूब मलिक का बेटा है और जानवरों को चराने का काम करता था. लेकिन शब्बीर की बात पर यकीन न करते हुए एक अफसर ने अपने सिपाही को बुलाकर लाश और आसपास की तलाशी लेकर हथियार बरामद करने को कहा और शब्बीर के पैर पर बंदूक के बट मारकर चोटें दी जाती रहीं. इतने में जवान लौटकर अफसर के पास आया.


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कश्मीर में आर्म्ड फोर्सेस. फाइल फोटो.

‘जनाब, लाश के कब्ज़े से और आसपास से कोई हथियार नहीं मिला.’
‘क्या बेहूदा बात है ये. हथियार नहीं मिला मतलब? बंदूकें कबूतर उठाकर ले गए क्या? जाओ ठीक से तलाशो.’
‘हर तरफ देख लिया जनाब लेकिन…’
‘एक काम ठीक से नहीं कर सकते तुम काहिल लोग. जाओ, जाकर फौरन वायरलैस लेकर आओ.’


वक्त तकरीन पौने पांच का हो चुका था. उस अफसर ने शब्बीर के सामने वायरलैस से अपने अफसरों से बातचीत करते हुए कहा – ‘हिज़्बुल-मुजाहिदीन के कमांडर को ठोक दिया जनाब.’ शब्बीर ने फिर दोहराया कि लाश सलीम की है और वह एक सीधा सादा नौजवान था. इस दौरान और इसके बाद आर्म्ड फोर्सेस एक मकान के एक टीन के छप्पर को तोड़ चुकी थीं. कुछ और मकानों पर गोलीबारी की जा चुकी थी और कुछ और मंसूबे बनाए जा रहे थे जैसे मलिक के मकान को बम से उड़ा दिया जाए.


कुछ देर पहले याक़ूब वहां पहुंच चुका था और उसने भी तस्दीक कर दी थी कि मारा गया लड़का सलीम था जो कश्मीरी था और इलाके का रहने वाला ही नौजवान था. अफसरों ने याक़ूब से कहा कि आर्म्ड फोर्सेस पर गोलीबारी की गई इसलिए जवाब में की गई फायरिंग में सलीम मारा गया. फिर फोर्सेस ने एक दो और लोगों को बुलाया, उनमें से एक कश्मीरी था जिसने शब्बीर से बातचीत की और कन्फर्म किया कि मारा गया लड़का आतंकवादी नहीं था.


इसके बाद आर्म्ड फोर्सेस के सभी लोग इकट्ठे हुए जिनमें कुछ पुलिस के लोग भी शामिल थे. सबने वहां से जाने का इरादा किया और लौटने का रुख किया. जाते जाते एक अफसर ने शब्बीर को खबरदार करते हुए कहा कि ‘किसी को ये नहीं बताना कि यहां हम आए थे ओर यहां क्या हुआ था.’ फिर बूटों की थर्राहट शुरू हुई और गाड़ियों के लौटने की आवाज़ें कुछ देर बाद थम गईं.


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फिर लोग उतरे सड़क पर
थोड़ी ही देर बाद. सुबह के करीब 6 बजे. मकानों से लोगों का निकलना शुरू हुआ. शब्बीर वहां ज़ख्मी हालत में एक एक कर सबको वाकया बता रहा था. कुछ ही मिनटों में सलीम के पिता याकूब मलिक और उनके परिवार में मातमी हायतौबा मच गई क्योंकि उनके लाड़ले की लाश पड़ी हुई थी. पूरे इलाके के लोग जमा हो गए थे और रात को हुए पूरे वाकये को जानने के बाद इस तमाशे के खिलाफ लामबंद हो चुके थे.


पुलिस लाश को कब्ज़े में लेने के लिए पहुंची तो सबने मिलकर पुलिस का विरोध किया और लाश को छूने तक की इजाज़त नहीं दी. एक औरत ने पुलिस के एक अफसर पर थूक भी दिया. मारे गए सलीम के परिवार ने चीख चीख कर पुलिस से कहा कि ‘हमारे लड़के ने हाथ में पत्थर कभी नहीं उठाया, फिर भी उसे इस तरह मार दिया गया. ये ज़ुल्म नहीं तो और क्या है?’ पूरा इलाका पुलिस के खिलाफ था इसलिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े. इसके बाद वहां मातमी सन्नाटा छा गया.


पुलिस ने ‘आॅपरेशन’ कहा तो फैमिली ने ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’
इधर, बीते 27 सितंबर को घटे इस पूरे घटनाक्रम के बारे में पुलिस प्रवक्ता का कहना था कि भरोसेमंद सूत्रों से जानकारी मिली थी कि नूरबाग के इस इलाके में आतंकवादी छुपे हुए थे. इस सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए आर्म्ड फोर्सेस ने इस इलाके के घेराबंदी की. इसी बीच इलाके में छुपे हुए आतंकियों ने गोलीबारी की तो फोर्स ने जवाबी फायरिंग की. रात थी, अंधेरा था और हमले के जवाब में ऐसे हालात बने कि सलीम की मौत हो गई.


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श्रीनगर में सलीम की कथित हत्या के बाद विलाप करते परिजन.

यह एक सोच समझकर की गई हत्या है. न तो हमारे इलाके में किसी आतंकवादी के होने की खबर थी न ही हिंदोस्तान के मीडिया में किसी एनकाउंटर की खबर थी. किसी बेकसूर को बगैर किसी वजह के कैसे मारा जा सकता है. ऐसे हत्यारों को सख़्त सज़ा मिलना चाहिए क्योंकि ऐसे ही तथाकथित आॅपरेशनों की वजह से कश्मीर के नौजवान आतंकवाद का रास्ता चुनने पर मजबूर हो जाते हैं.


यह कहना है मारे गए 26 वर्षीय सलीम के पिता याक़ूब मलिक का, जिन्होंने सलीम की मौत को ठंडे दिमाग से की गई हत्या करार देते हुए सुरक्षा बलों पर आरोप लगाया है. याक़ूब का यह भी दावा है कि सलीम का किसी गैर कानूनी या दहशतगर्दी की गतिविधि से कभी कोई नाता नहीं रहा और उसका कोई पुलिस रिकॉर्ड नहीं था.


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