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रोज़ाना की तरह उस शाम भी दोस्तों के साथ मोहम्मद घर से कुछ दूर खेलने गया था लेकिन दोस्त तो अपने घर लौटे, मोहम्मद नहीं. अगले दिन मोहम्मद की लाश के चीथड़े मिले. रेलवे पुलिस ने दो दिन में नतीजा सुना दिया कि एक हादसे में मोहम्मद ट्रेन से कुचला गया. लेकिन, इस बात पर मोहम्मद के बाप को यकीन नहीं हुआ. उस शाम क्या हुआ था? उसने तय कर लिया कि वह सच जानकर ही दम लेगा और एक ड्राइवर से जासूस बन बैठा.दो साल पहले 4 नवंबर 2016 की शाम हुआ ये था कि अक्सर की तरह मोहम्मद ने अपनी मां से कहा कि वो खेलने जा रहा है. मुंबई के मीरा रोड इलाके के पूजा नगर की बस्ती में 14 साल का मोहम्मद अपने परिवार के साथ रहता था. घर के पास ही रेलवे ट्रैक्स यानी पटरियां थीं लेकिन छोटी बस्ती के बच्चों के खेलने का अड्डा बन चुकी थीं. ट्रेनें आती जाती थीं लेकिन बच्चे बरसों से यहां खेलते थे और अपने हिसाब से सतर्क रहा करते थे.
अंधेरा हो गया और मोहम्मद जिन दोस्तों के साथ खेलने गया था, वो घर लौट चुके थे लेकिन मोहम्मद अब तक नहीं आया था. उसकी मां ने आसपास के बच्चों से पूछताछ की तो सबने कहा कि मोहम्मद उनके साथ ही लौटा था लेकिन घर क्यों नहीं पहुंचा? उन्हें नहीं मालूम. एक लड़का था रेहान (काल्पनिक नाम) जो मोहम्मद का दोस्त था. उसने घबराते हुए बताया कि मोहम्मद तो मेरे साथ ही लौटा था लेकिन फिर वो अपनी गली में चला गया था.
मोहम्मद की मां को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उसने अपने पति यानी मोहम्मद के पिता शब्बीर को फोन पर सब कुछ बताया. शब्बीर दुबई में ड्राइवर के तौर पर काम करता था लेकिन कुछ दिनों के लिए घर आया हुआ था. शब्बीर ने रात भर पूछताछ और तलाश शुरू की. पुलिस में खबर की और अगली सुबह रेलवे ट्रैक्स पर मोहम्मद की लाश चीथड़ों में मिली. उसके कपड़ों और कुछ चीज़ों से पहचान हो सकी कि ये चीथड़े मोहम्मद के ही थे.
एक हंसता खेलता परिवार मातम में डूब गया और मोहम्मद की मां, दोनों बहनें चीख चीखकर रोते रहे. शब्बीर सबको संभालता रहा और साथ में पुलिस की मदद से जानकारियां लेता-देता रहा. जीआरपी यानी रेलवे पुलिस ने इस मामले को एक्सीडेंट बताकर दो दिनों के भीतर केस बंद कर दिया लेकिन शब्बीर को ये बात हज़म नहीं हुई क्योंकि एक तो उसे भावनात्मक तौर पर ये यकीन नहीं था कि उसका बेटा इस तरह मर सकता है और दूसरे साथी बच्चों की घबराहट उसे शक करने पर मजबूर कर रही थी.
मोहम्मद की मौत से पूरे मोहल्ले खासतौर से उसके दोस्तों के बीच एक मातमी सन्नाटा फैल गया था. सब डरे-सहमे और घबराये हुए दिख रहे थे. खेलकूद, मौज मस्ती अगले कई दिनों के लिए बंद हो गया था. कोई बच्चा रेलवे ट्रैक्स की तरफ खेलने नहीं जा रहा था. जब भी वहां से ट्रेन धड़धड़ करती हुई गुज़रती, रेहान या कोई और बच्चा बुरी तरह डर जाता था. मौत की रस्में वगैरह से फारिग होने के बाद शब्बीर ने दुबई में फोन कर अपनी नौकरी छोड़ने की बात की.
47 वर्षीय शब्बीर ने तय कर लिया था कि वह मोहम्मद की मौत का सच ढूंढ़कर ही रहेगा, उसे पुलिस की मदद मिले या नहीं. इधर उसकी बीवी को फिक्र यह थी कि नौकरी छोड़कर घर कैसे चलेगा? शब्बीर ने कहा कि कुछ महीनों के लिए तो इंतज़ाम है और अगर उससे भी ज़्यादा वक्त लगेगा, तब भी वह देगा. शब्बीर ने अपनी बीवी और कुछ रिश्तेदारों को इस अरसे में मदद करने के लिए राज़ी किया और जासूसी करने में जुट गया.
अब शब्बीर ने कैमरे और रिकॉर्डिंग वाला अपना फोन लेकर उन बच्चों से मिलने का इरादा किया जो उस शाम मोहम्मद के साथ थे. बच्चे भी अब भी शॉक में थे इसलिए वही एक दो जुमले बोलकर घबरा जाते या रोने लगते या चुप हो जाते. उनके मां बाप भी उनके शॉक में होने का हवाला देकर सदमे से उबरने में कुछ वक्त लगने की बात कहते. इलाके में घूमते हुए शब्बीर की नज़र आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों पर गई.
शब्बीर एक एक कर हर सीसीटीवी पैनल के मालिक या संचालक से मिला और अपने बच्चे की मौत की बात बताकर उस शाम के फुटेज चेक करने की गुज़ारिश की. एक सीसीटीवी फुटेज में साफ दिखाई दिया कि उस शाम रेहान और दो एक बच्चे और घरों को लौटे थे लेकिन उनके साथ मोहम्मद नहीं था जबकि बच्चे यही कहते रहे थे कि मोहम्मद उनके साथ ही लौटा था. इस फुटेज में घर लौटते रेहान की बॉडी लैंग्वेज से ये भी ज़ाहिर था कि बच्चे कुछ घबराये हुए थे.

शब्बीर के हाथ एक जायज़ शक लगा था कि कुछ बात थी जो छुपाई जा रही थी. उसने फिर रेहान से पूछा लेकिन उसने वही कहते हुए फिर रोना शुरू कर दिया. इसके बाद शब्बीर ने और भी बच्चों से पूछताछ की तो किसी ने कहा कि उस वक्त मोहम्मद अप ट्रैक पर खड़ा था, तो किसी ने बताया कि वह डाउन ट्रैक पर था. ये तमाम बातें शब्बीर को उलझन में डाल रही थीं और उसे यकीन हो चुका था कि मोहम्मद की मौत हादसा नहीं थी.
शब्बीर ने हार नहीं मानी थी. वह बच्चों की मानसिक हालत समझ सकता था इसलिए उसने सब्र से काम लिया और करीब दो महीने तक रेहान के साथ गाहे-ब-गाहे वक्त बिताया. उसे मजबूर करने के बजाय उसके साथ हमदर्दी से पेश आया और धीरे धीरे वक्त ने ज़ख़्म भरे और फिर रेहान ने शब्बीर को सच बताया कि उसने मोहम्मद की मौत अपनी आंखों से देखी थी.
अब रेहान की ज़बानी उस शाम की कहानी शब्बीर सुन रहा था और उसकी आंखों के कोने भीग रहे थे. उस शाम मोहम्मद जब अपने दोस्तों के साथ अपने नये मोबाइल के साथ तस्वीरें खींच रहा था, तभी कुछ गुंडे बदमाश किस्म के थोड़े बड़े लड़के वहां आए और उन्होंने मोहम्मद से नया मोबाइल फोन मांगा. मोहम्मद ने मना किया तो उसे पीटा और फिर हाथापाई करते हुए उससे मोबाइल फोन छीन लिया. उसकी जेब में पॉकेट मनी के जो पैसे थे, वो भी छीन लिये.
इन लड़कों की गुंडागर्दी से सभी पहले से वाकिफ थे इसलिए कोई इनसे जूझता नहीं था. मोहम्मद अकेला ही जूझ रहा था और उसके दोस्त खड़े देख रहे थे. मोबाइल फोन छीनने से नाराज़ मोहम्मद ने उन लड़कों से अपना फोन वापस लेने की कोशिश की लेकिन उन्होंने उसे झटकते हुए ज़ोर से धक्का दिया. मोहम्मद रेलवे ट्रैक पर जैसे ही गिरा, तभी वहां से धड़धड़ाती हुई एक ट्रेन गुज़री और मोहम्मद को कुचलती चली गई. ये देखकर वो लड़के वहां से भाग खड़े हुए और मोहम्मद के दोस्त दहशत में आने के बाद अपने घरों को लौटे.

मृतक मोहम्मद और मृतक का पिता शब्बीर.
अब तक शब्बीर रेहान और मोहम्मद के साथी रहे बाकी लड़कों के साथ हुई बातचीत को रिकॉर्ड कर चुका था. अब उसने उन लड़कों की तलाश और उनके बारे में तफ्तीश की तो उसे पता चला कि वो गुंडे किस्म के लड़के ड्रग्स और जुए जैसी लतों के शिकार हैं इसलिए रेलवे ट्रैक्स पर पहले भी बच्चों को परेशान करते थे और कुछ और लोगों से पैसे वगैरह छीनने का काम करते थे. यही लड़के मोहम्मद की मौत के ज़िम्मेदार थे.
मोहम्मद की मौत को करीब आठ महीने हो चुके थे और शब्बीर केस को लगभग सुलझा चुका था. उसने तमाम सबूत और रिकॉर्डिंग्स तैयार कर पूरी रिपोर्ट तैयार की और अगस्त 2017 में शब्बीर ने ये रिपोर्ट रेलवे कमिश्नर के सामने पेश करते हुए दरख्वास्त दी कि उसके बेटे की मौत को हत्या का मामला मानकर दोषियों को सज़ा दिलवाई जाए. इस पर एक्शन लेते हुए चार लड़कों के खिलाफ केस दर्ज किया गया और उन्हें पकड़ने की कवायद की गई. इनमें से तीन की उम्र 15 साल थी जबकि चौथे की 16.
मोहम्मद की मौत और शब्बीर की तफ्तीश के दो साल बाद अब इन लड़कों के खिलाफ आरोप तय किए जाने की कवायद जारी है और रेलवे पुलिस इन्हें जुवेनाइल कोर्ट से सज़ा दिलवाने की तैयारी में है. इधर, शब्बीर का कहना है –
मैंने दो साल आंसू और पसीना पोंछ पोंछकर इन अपराधियों तक पहुंचने में कामयाबी पाई है. मुझे पता है कि इस सबसे मेरा बेटा वापस नहीं आ जाएगा लेकिन अब मैं और मेरा परिवार उसके लिए इंसाफ चाहते हैं. एक मौत जो हादसा नहीं, कत्ल थी, उसके लिए इंसाफ होना चाहिए.
लेकिन एक सच यह भी है कि इस पूरी तफ्तीश के दौरान शब्बीर ने कई रातें रो रोकर काटीं. कई बार खुद को कोसा भी और खुद को भी एक हद तक मोहम्मद की मौत का ज़िम्मेदार समझा क्योंकि मौत से कुछ दिन पहले मोहम्मद ने उसे बताया था कि दोस्तों के साथ खेलने के वक्त कुछ लड़कों ने उसे परेशान किया था. तब शब्बीर ने बच्चों की आपसी खटपट और झगड़ा समझकर बात को अनदेखा कर दिया था. शब्बीर को कई बार लगता है कि अगर उस बात को उसने सीरियसली लिया होता तो शायद मोहम्मद ज़िंदा होता. अपनी इस गलती के लिए शब्बीर शायद खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगा.
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