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बिन्नू के. जॉनमंदिरों में ‘नीची जाति के लोगों’ का प्रवेश रोकने वाली प्रथा को साल 1936 में खत्म कर दिया गया था. इसके करीब सौ साल बाद केरल में एक और बड़ा सामाजिक बदलाव आने को है. सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के जाने और पूजा अर्चना करने पर लगी रोक हटा दी है. इस ऐतिहासिक फैसले के कुछ दिन बाद राज्य के हिन्दू समुदाय के एक वर्ग में असंतोष है.
इस असंतोष के परिणामस्वरूप अदालत के फैसले के खिलाफ पहला विरोध प्रदर्शन किया गया. यह विरोध प्रदर्शन केरल के पंडालम में हुआ. आयोजकों का दावा है कि 50,000 महिलाओं ने 2 अक्टूबर को जुलूस में हिस्सा लिया था. जूलूस में हिस्सा लेने वाली सुरेश कुमारी ने कहा, ‘हम मंदिर जाना नहीं चाहते हैं. फैसला हमारे लिए काफी दुखद है, उसने हमें मानसिक तनाव में भी डाल दिया है. हम मंदिर महिलाओं को जाते नहीं देख सकते. मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए हिन्दुओं को समर्थन चाहिए.’
यह भी पढ़ें: सबरीमाला मंदिर विवाद पर RSS का यू-टर्न, कहा- सरकार ने भक्तों की भावनाओं को किया नज़रअंदाज़केरल में राजनीतिक दल दुविधा में हैं और कोई भी राजनेता खुलेआम निर्णय का समर्थन करने या उसका विरोध करने के लिए तैयार नहीं है. बीजेपी, राज्य में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है जहां बीते साल हुए विधानसभा चुनाव में इसका खाता खुला है. यहां तक कि बीजेपी के नेताओं ने भी आधे दिल से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया है हालांकि यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करा कर सामने आने की कोशिश में है.
पंडालम में आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए बीजेपी के जिलाध्यक्ष अशोकन कुलंदा ने कहा, ‘कई बीजेपी के कार्यकर्ता और संघ परिवार के लोग इसमें शामिल हुए. मैं भी शामिल था.’
नायर सर्विस सोसाइटी के करीबी कांग्रेस के मुख्यमंत्री उम्मीदवार रमेश चेनिथला ने शाही परिवार के कुछ सदस्यों से मुलाकात की ताकि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति न देने वाली पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण का समर्थन किया जा सके. कांग्रेस इस मुद्दे पर राज्य में विभाजित है, क्योंकि वह इस डर में है कि इसका उच्च जाति हिंदू वोट बैंक खुश नहीं होगा.
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सीएम पिनराई विजयन ने प्रगतिशील विचार के साथ बहादुरी से निर्णय का समर्थन किया. अदालती समीक्षा की अपील नहीं किए जाने का फैसला किया. कांग्रेस को लगता है कि केरल में अपने सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड को खेलने का सही समय है. यह चेनिथला के पांडलम महल जाने की मूक यात्रा का महत्व है.
पुजारी परिवार से जुड़े राहुल ईश्वर ने कहा कि हम नारीवादियों और महिलाओं को मंदिर आने से नहीं रोकेंगे. हम उन पर दबाव नहीं डालेंगे, लेकिन खुद को तैयार रखें क्योंकि वह हमारे दिल को कुचल कर मंदिर में जाएंगी.
मंदिर को नियंत्रित करने वाले त्रावणकोर देवासम बोर्ड ने फैसले का स्वागत किया और मंदिर तक आने वाली बसों में महिलाओं के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित कर दी हैं. बोर्ड ने फैसला किया है कि महिलाएं मंदिर के गर्भगृह में इसी महीने की 17 अक्टूबर से जा सकती हैं.
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इसलिए सबरीमाला यात्रा के बाद एक नया आदमी या शुद्ध व्यक्ति बनने की यह पूरी धारणा (अन्य मंदिर यात्राओं के विपरीत) अब महिलाओं द्वारा भी उसका पालन किया जा सकता है. वे अब भी 40 दिनों के तपस्या से गुजरकर शुद्धता का दावा कर सकती हैं, पहाड़ियों पर चलते हैं और फिर अयप्पा से सिर पर इरुडी रख कर मिलेंगी.
(लेखर वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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