Friday, 26 October 2018

OPINION: कन्हैया की 'म्यान' में कैसे जाते तेजस्वी!


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(अनिल राय)लोकसभा चुनावों के पहले जब भी महागठबंधन बनाने की कोशिश होती है, तो उसका कोई-न-कोई पेंच जरूर ढीला हो जाता है. ताजा मामला बिहार के पटना में हुई कन्हैया कुमार की रैली का है. पटना में महागठबंधन की रैली से तेजस्वी के गायब होने की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए. क्योंकि बिहार में तेजस्वी के बिना महागठबंधन के बारे में सोचना ही ख्याली पुलाव जैसा है. हालांकि आरजेडी ने इस रैली में प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे को भेजकर अपनी हाजिरी जरूर लगा दी.


तेजस्वी के न पहुंचने का असर पटना रैली में साफ-साफ दिखा भी. लेफ्ट, कांग्रेस, एसपी, जेडीयू के दर्जनों नेताओं के मंच पर होने के बावजूद रैली में उतनी भी भीड़ नहीं आ पाई, जितनी एक महीना पहले हुई माकपा (माले) की रैली में दिखी थी. ऐसे में जेहन में ये सवाल उठना लाजिमी है कि पटना में होने के बावजूद तेजस्वी रैली में गए क्यों नहीं? इस बात को समझने के लिए चुनाव पूर्व होने वाली छोटी बड़ी रैलियों के गणित को समझना पड़ेगा.


दरअसल चुनाव पूर्व स्थानीय नेता से लेकर राजनीतिक दल तक रैली के सहारे अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करते हैं. जहां स्थानीय नेता रैलियों की ताकत के बहाने अपनी टिकट की दावेदारी मजबूत करने की कोशिश करते हैं वहीं राजनीतिक दल इन रैलियों की भीड़ का सौदा गठबंधन की सीटों से करते हैं. ऐसे में कन्हैया की रैली के बहाने सीपीआई पटना में अपनी ताकत दिखाना चाह रही थी. लेकिन राजनीति में परिपक्व हो चुके तेजस्वी राजनीति के धुरंधरों की ये चाल भांप गए कि आने वाले समय में उनके चेहरे के बहाने जुटाई गई भीड़ का इस्तेमाल उन्हीं पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है और यही वो सबसे बड़ी वजह रही, जिसके कारण लालू परिवार से कोई ऐसा शख्स मंच पर नहीं दिखा, जिसके बहाने भीड़ जुटाई जा सकती हो.तेजस्वी के न आने को राजनीति में उभरते सितारों की जंग के तौर पर भी देखा जा सकता है. तेजस्वी जहां पिछले दो साल में बिहार की राजनीति के क्षितिज पर उभरे सबसे बड़े नेता हैं वहीं कन्हैया कुमार ने भी देश भर में एक युवा राजनेता की छवि इन्हीं सालों में बनाई है और दोनों ही कट्टर बीजेपी विरोधी चेहरे हैं. संयोग से कन्हैया भी बिहार से हैं और अब तक ये साफ हो चुका है कि उनकी राजनीतिक कर्मभूमि भी बिहार ही रहने वाली है. ऐसे में तेजस्वी अपने बराबर किसी दूसरे दल के नेता के उभार को अपनी मौजूदगी से और मजबूत नहीं कर सकते.


ये सही है कि आज तेजस्वी और कन्हैया दोनों ही बीजेपी विरोध के चेहरे हैं लेकिन बिहार की राजनीति में आने वाले वक्त में दोनों की महत्वाकांक्षाएं एक दूसरे को असहज भी कर सकती हैं. ऐसे में साफ है कि तेजस्वी बिहार में गठबंधन तो चाहते हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर. साथियों को जगह तो देने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने बराबर कद का दूसरा राजनेता पैदा होने देने की कीमत पर नहीं.


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