Friday, 24 August 2018

गुजरात में मुस्लिम मछुआरों का आरोप- धर्म के आधार पर हो रहा भेदभाव


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विजयसिंह परमारगुजरात के जुनागढ़ जिले के मांगरोल पोर्ट पर मुसलमान मछुआरे अपनी नाव नहीं लगा सकते. पास के कस्बे में संख्या में ज्यादा इस समुदाय के मछुआरे ये आरोप लगाते हुए बताते हैं कि जिन नावों के मालिक मुसलमान हैं उन्हें मांगरोल बंदरगाह पर नहीं लगाने दिया जाता. जबकि ये बंदरगाह राज्य सरकार का ही है.


आजादी के पहले से जब यहां मुसलमान शासकों का राज था उस समय से मांगरोल कस्बे में मुसलमान ही अधिक संख्या में हैं. अब यहां इस समुदाय के लिए भेद भाव कुछ इस तरह है कि यहां मांगरोल पोर्ट पर नाव लगाने से ही मुसलमानों को रोक दिया गया है.


इस कस्बे की आबादी 1.5 लाख है और यहां की 80 फीसदी आबादी मुसलमान है. मांगरोल बोट एसोसिएशन के अध्यक्ष हनीफ पटेल बताते हैं, “मांगरोल में मछली पकड़े वाली नौकाओं समेत कुल 1800 नावें हैं. इसमें से मुसलमानों के पास तकरीबन 120 मछली पकड़ने वाली नौकाएं हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से वे इन्हें मंगलोर पोर्ट पर नहीं लगा सकते. इसकी वजह कुछ भी नहीं सिर्फ भेद भाव हैं और इसके जरिए हमारी रोजी रोटी पर प्रहार किया जा रहा है. मुसलमानों को देवभूमि द्वारका के ओखा पोर्ट में अपनी नावों को लगाना पड़ता है जो मंगलोर से ढाई सौ किलोमीटर दूर है.”उनका कहना है कि मांगरोल में रोजगार का कोई दूसरा साधन नहीं है. कोई उद्योग नहीं है. मछली पकड़ कर ही अपनी रोजी चलाई जा सकती है. पिछले डेढ़ दशक से यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यही है. किसी तरह के बवाल से बचने के लिए संख्या में ज्यादा होने के बाद भी समुदाय के लोगों ने मंगलोर पोर्ट छोड़ कर ओखा जाना स्वीकार कर लिया है.



मांगरोल पोर्ट

बहरहाल, यहां के अफसर इस तरह के किसी भी भेदभाव से इनकार करते हैं. फिशरी डिपार्टमेंट के इंचार्ज सुपरीटेंडेंट पीआर राडा का कहना है, “मांगरोल पोर्ट पर धर्म के आधार कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन वहां की क्षमता ही महज 400 नावों की है. जबकि मांगरोल में ही 1800 नावें हैं. क्षमता को लेकर ही दिक्कत है. सरकार जल्द ही इसे 1200 तक बढ़ाने की योजना बना रही है.”


गुजरात में मछुआरों की सबसे बड़ी को- ऑपरेटिव संस्था गुजरात फिशरिज सेंट्रल को- ऑपरेटिव लिमिटेड के चेयरमैन वेलजीभाई मसानी ने न्यूज 18 को बताया कि हिंदू मछुआरों को भी दूसरे पोर्ट पर जाना पड़ता है. क्योंकि इसके विस्तार के 150 करोड़ रुपये की परियोजना अभी विचाराधीन है. उनका कहना है कि एक बार विस्तार हो गया तो फिर सभी को वहां जगह मिल सकेगी.


इसके विपरीत एक मछुआरे अब्दुल सामा का तर्क है कि अगर मांगरोल पोर्ट पर सिर्फ 400 नावों को ही हैंडल कर पाने की क्षमता है तो फिर हिंदू मछुआरों को भी दूसरे पोर्ट पर जाना चाहिए लेकिन सिर्फ मुसलमानों की नावों के ही वहां लगाने पर रोक क्यों है.


अब्दल समा का आरोप है, “मंगलोर पोर्ट पर मुसलमान मछुआरों को नाव नहीं ले जाने दिया जाता है, लिहाजा उन्हें कई बार पास के ही एक कुदरती मांगरोल बारां में अपनी बड़ी नावों तक छोटी नावों को लेकर जाना पड़ता है, जो काफी खतरनाक है और वहां बहुत से मछुआरों की जान भी जा चुकी है. ये सरासर भेदभाव का मामला   है.”


फाइबर ग्लास  की नावें बनाने वाले मांगरोल फाइबर ग्लास एसोसिएशन के अध्यक्ष हारुन पांड्या कहते हैं,  “मंगलोर को फाइबर ग्लास वाली नावें बनाने के लिए भी देश भर में जाना जाता है. 2015 में सरकार ने 4.64 करोड़ रुपये की लागत से मंगलोर पोर्ट के पास ही मांगरोल बारां बनाने की एक योजना भी बनाई थी, फिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और हमें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चला.”


Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/karobar/vijay-malya-big-defaulters-of-india-adani-power-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%95-%E0%A4%A1%E0%A4%BF-465551.html

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