Friday, 29 December 2017

जाधव तो ठीक पर हमारे पापा की क्या गलती जो पाकिस्तान में बंद हैं


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पाकिस्तान जेल में बंद कुलभूषण जाधव अकेला भारतीय नहीं है. 54 और भी भारतीय हैं जो 46 और 52 साल से पाक की जेलों में बंद हैं. ये वो बंदी हैं जो युद्ध के दौरान बंधक बनाए गए थे.पाक जेल में 17 आर्मी अफसर, 12 सिपाही,  24 एयर फोर्स अफसर और एक नेवी अफसर बंद हैं. युद्धबंदियों के परिजन समय-समय पर अपनों के वहां होने के सबूत देते रहते हैं. हालांकि पाक अब ये मानने से भी इंकार करता है कि उसके यहां भारत का कोई युद्धबंदी भी है.


लेकिन कुलभूषण जाधव के परिवार की उनसे मुलाकात के बाद अब इन 54 युद्धबंदियों के परिवार में भी एक उम्मीद जागी है कि जल्द ही सरकार उनके अपनों के लिए भी कुछ करेगी. ऐसे ही दो युद्धबंदियों के परिजन विपुल पुरोहित और डॉ. सिमी बराइच से बात की हिन्दी न्यूज18 डॉट कॉम ने.


विपुल पुरोहित पुत्र युद्धबंदी फ्लाइट लेफ्टीनेंट मनोहर पुरोहित


युद्धबंदी फ्लाइट लेफ्टीनेंट मनोहर पुरोहित के पुत्र विपुल पुरोहित कहते हैं कि हमे खुशी है कि कुलभूषण जाधव के परिवार की उनसे मुलाकात हो गई. लेकिन इसके साथ ही सरकार ये भी न भूले कि पाकिस्तान में 54 भारतीय युद्धबंदी भी हैं. उनके परिवार वाले भी अपनों से मिलने के लिए यहां तड़फ रहे हैं.



मैं खुद बचपन से अपने पिता की एक झलक देखने के लिए बैचेन हूं. मैंने आज तक अपने पिता को नहीं देखा है. मैं उस वक्त मां की गोद में था. पहले मां और अब मां के साथ मैं लगातार अपनों से मिलने के लिए एक लड़ाई लड़ रहे हैं.


मां ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मावाधिकार आयोग, रेडक्रॉस सोसाइटी सहित शायद ही कोई ऐसा संबंधित विभाग हो जिसे चिठ्ठी न लिखी हो. लेकिन कोई फायदा नहीं निकला. अभी तक लड़ाई में बंदी बनाए गए अफसरों की कोई सुध नहीं ली गई है.



हम सुप्रीम कोर्ट में भी केस लड़ रहे हैं. हमारी बस एक ही मांग है कि जिस तरह से कुलभूषण जाधव का मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया उसी तरह से मेरे पिता सहित सभी 54 युद्धबंदियों का मामला भी इंटरनेशनल कोर्ट में उठाया जाए. पाकिस्तान पर दबाब बनाकर सभी युद्धबंदियों को रिहा कराया जाए.


डॉ. सिमी बराइच पुत्री मेजर एसपीएस बराइच, 15 पंजाब रेजीमेंट


मेरे पिता मेजर एसपीएस बराइच को युद्ध के दौरान बंदी बना लिया गया था. कहने को तो सरकार ने इस संबंध में एक कमेटी बनाई हुई है. लेकि कमेटी पांच-छह महीने में एक बार ही कोई कार्रवाई करती है.



मुद्दे को बेहद कमजोर तरीके से पाक के सामने उठाया जा रहा है. जबकि कई तरह के सबूत सामने आ चुके हैं. मेजर अशोक सूरी की चिठ्ठी भी 1975 में उनके परिवार वालों को मिल चुकी है. ओमान की एक जेल में भी पंजाब रेजीमेंट का एक युद्धबंदी सिपाही जसपाल पंजाब से ओमान काम करने गए सुखदेव को मिल चुका है. लेकिन इसके बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई.



हमारे अपनों को तलाशने के नाम पर ये बोल दिया जाता है कि आप सब लोगों को पेंशन, फण्ड का पैसा और दूसरे अन्य मुआवजे मिल चुके है, इसलिए अब आप लोगों का कोई केस ही नहीं बनता है. जबकि हैरत की बात ये है कि बांग्लादेश आज भी भारत में आकर अपने युद्धबंदियों को तलाश रहा है.


हमारी मांग बस इतनी सी है कि कुलभूषण जाधव की तरह से ही 54 युद्धबंदियों के केस को भी इंटरनेशनल लेवल पर उठाकर पाकिस्तान पर दबाब बनाया जाए कि वह हमारे परिजनों से हमारी मुलाकात कराए.

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