READ MORE
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि एक ऐसे व्यक्ति की पहचान जीवन के किसी भी स्तर पर उजागर नहीं की जानी चाहिए जब नाबालिग रहने के समय उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया था. अदालत ने कहा कि किशोर की पहचान उजागर किये जाने से किशोर न्याय कानून का उद्देश्य निष्फल होता है.न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति रेखा पल्ली की एक पीठ ने एक मामले में यह टिप्पणी की. मामले के अनुसार रेलवे बोर्ड ने रिजर्व पुलिस बल (आरपीएफ) में एक कांस्टेबल को सेवा से इस आधार पर हटा दिया था कि उन्होंने (कांस्टेबल) ने खुद के खिलाफ दर्ज एक लंबित आपराधिक मामले के बारे में खुलासा नहीं किया था.
कांस्टेबल के खिलाफ यह मामला उस घटना के लिए दर्ज किया गया था जब वह 12 वर्ष के थे. अदालत ने रेलवे बोर्ड के 11 मई के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि यह टिकने योग्य नहीं है. उन्होंने अधिकारियों को सभी अहम लाभों के साथ 12 सप्ताह के भीतर कांस्टेबल को बहाल करने के निर्देश दिये.
पीठ ने कहा कि जब अधिकारियों के निर्देशों पर व्यक्ति का पुलिस सत्यापन किया गया था तो उस समय संबंधित अधिकारियों को उस आपराधिक मामले के बारे में सूचना का खुलासा करने से बचना चाहिए था जो उसके खिलाफ तब दर्ज किया गया था जब वह किशोर था.व्यक्ति के वकील ने अदालत को बताया कि उनके (कांस्टेबल) खिलाफ बिहार के गोपालगंज में किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई हुई थी और उन्हें अगस्त 2015 में बरी कर दिया गया था. वह दंगे और हत्या के प्रयास के कथित मामले के समय किशोर थे और उनके बचपन से संबंधित इस सूचना का खुलासा करने की जरूरत नहीं थी.
सरकार की तरफ से पेश वकील ने हालांकि इसका विरोध करते हुए कहा कि व्यक्ति का यह कर्तव्य था कि वह सत्यापन फॉर्म को भरने के समय उसके खिलाफ लंबित आपराधिक मामले के बारे में संबंधित विवरण प्रस्तुत करें लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहा.
ये भी पढ़ें-
किसी को सरकारी जमीन को कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल का अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
लाल कोट अतिक्रमण को लेकर HC ने लगाई दिल्ली नगर निगम को फटकार
Article source: http://hindi.pradesh18.com/news/nation/supreme-court-will-inspect-ordinance-of-gujrat-government-on-reservation-1483491.html
No comments:
Post a Comment