Thursday, 28 June 2018

बैटल ऑफ बंगाल: लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी और टीएमसी के बीच कैसा होगा संघर्ष?


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देश के करीब 70 फीसदी आबादी पर शासन कर रही बीजेपी ने ‘मिशन बंगाल’ की शुरुआत कर दी है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पुरुलिया में रैली की है. शुक्रवार को भी उनके कार्यक्रम हैं.  रैली के बहाने शाह ने मारे गए अपने दो पार्टी कार्यकर्ताओं के मसले पर तृणमूल कांग्रेस को घेरने की कोशिश की. शाह ने कहा कि अगर तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि हिंसा के जरिए वह सत्ता में बनी रह सकती है तो मैं उसको चुनौती देता हूं कि हमारे कार्यकर्ताओं का बलिदान बेकार नहीं जाएगा और तृणमूल कांग्रेस की सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी.हालांकि, आरोपों पर जवाब देने के लिए पुरुलिया में ही एक जुलाई को तृणमूल कांग्रेस भी रैली करेगी. दिलचस्प बात ये है कि यहां बीजेपी और तृणमूल दोनों एक दूसरे के कोर वोटर को तोड़ने की कोशिश में जुटे हुए हैं. बीजेपी मुस्लिमों को लुभा रही है, जबकि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस हिंदुओं को. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या भारतीय जनता पार्टी तृणमूल की सियासी जमीन खा पाएगी?  


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बीजेपी ने पूर्वोत्तर में अपना परचम फहरा दिया है, लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी उसकी सियासी दाल नहीं गलने दे रही हैं. पश्चिम बंगाल में विधानसभा की 294 सीट हैं. बीजेपी ने 2016 के विधानसभा चुनाव में 291 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे. लेकिन उसे सिर्फ तीन सीट पर संतोष करना पड़ा. 263 पर जमानत जब्त हो गई. हालांकि, उसे 10.16 फीसदी वोट मिले. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए 17.02 वोट हासिल किए, भले ही उसे सीट सिर्फ 2 मिली हो.फिलहाल, राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस,  प्रमुख विपक्षी सीपीएम और कांग्रेस को पछाड़ कर बीजेपी नंबर दो की कुर्सी पर काबिज होने की जद्दोजहद कर रही है. उसे कुछ जगहों पर कामयाबी भी मिली है. बीजेपी का बड़ा सहारा जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं, जिनका जन्म कोलकाता में हुआ था. उनकी राजनीतिक अपील है. माना जा रहा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संघ के मंच पर जाना भी संघ और बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है.




फिलहाल, बीजेपी की नजर 2019 के लोकसभा चुनाव पर लगी हुई है. 42 लोकसभा क्षेत्रों वाले इस प्रदेश में असली सियासी संघर्ष बीजेपी और तृणमूल के बीच देखने को मिलेगा. सूत्रों का कहना है कि बीजेपी की कोशिश है कि इस बार बंगाल से कम से कम 15 लोकसभा सीटें जीती जाएं. इसके लिए बीजेपी ने जाल बिछाना शुरू कर दिया है. अपने कार्यकर्ताओं की कथित हत्या को वह हथियार बना रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लंबे समय से बंगाल में काम कर रहा है. आरएसएस से जुड़ा स्कूलों का संगठन विद्या भारती वहां काम कर रहा है.


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फरवरी में ममता बनर्जी सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े सवा सौ स्कूलों को बंद करने का फरमान जारी किया तो सियासी विवाद शुरू हो गया. जानकार बताते हैं कि इन स्कूलों के माध्यम से बंगाल में आम लोगों के बीच संघ और बीजेपी दोनों अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक आरएसएस दक्षिण बंगाल में 910 जबकि उत्तरी बंगाल में 452 शाखाएं संचालित कर रहा है. राज्य में 226 मंडलों के माध्यम से भी संघ की गतिविधियां चल रही हैं. संघ के ‘जॉइन आरएसएस’ कैंपेन से भी राज्य में संगठन के विस्तार में बड़ी मदद मिली है.


सत्ता में आने के पैंतरे:एक दूसरे के वोटबैंक पर नजर


पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीजेपी और तृणमूल दोनों अपनी पारंपरिक छवि के उलट एक दूसरे के कोर वोटबैंक में सेंध लगाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. ममता बनर्जी ने बीजेपी की काट के लिए ब्राह्मण, पुरोहित सम्मेलन करवाया, गाय बांटी, जबकि बीजेपी यहां मुस्लिमों को लुभा रही है. उसने यहां अल्पसंख्यक सम्मेलन आयोजित किया. ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पंडितों और पुरोहितों को यह कहकर लुभा रही है कि हिंदुत्व पर किसी पार्टी का कॉपीराइट नहीं हैं. पश्चिम बंगाल में करीब 8 फीसदी ब्राह्मण हैं. जिन्हें साधने की कोशिश हो रही है.


भारतीय जनता पार्टी, ममता बनर्जी पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है. दूसरी ओर ममता बनर्जी बीजेपी पर हिंदुत्व के नाम पर कट्टरता फैलाने के आरोप लगाती हैं. लेकिन ये सियासत है, इसमें वोट के लिए कोई भी पार्टी कुछ भी कर सकती है. इसलिए दोनों की नजर एक दूसरे के पारंपरिक वोटबैंक में तोड़फोड़ करने पर लगी हुई है.


राज्य में लगभग 28 फीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है और कई क्षेत्रों में तो मुस्लिम वोट ही निर्णायक स्थिति में हैं. इसीलिए ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यकों को साधने के लिए काम शुरू किए. इससे उनकी छवि मुस्लिम परस्त बनाने की कोशिश की गई. माना जाता है कि इसीलिए मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों का जवाब देने के लिए बनर्जी सरकार ने गरीब ग्रामीण परिवारों को गाय वितरित करने का फैसला किया. हालांकि सरकार का कहना है कि इसका मकसद दूध उत्पादन को बढ़ावा देना है. इसे सियासत से न जोड़ा जाए.


चुनाव आयोग के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बीजेपी पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करती नजर आ रही है.  उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ रहा है और सीटें भी. इसलिए अमित शाह को लगता है कि पूर्वोत्तर फतह करने के बाद लेफ्ट और तृणमूल के गढ़ में पैठ बनाई जा सकती है. लेकिन क्या ये काम आसान है?


किसकी जगह लेगी बीजेपी? 


सेंटर फॉर स्टडी इन सोशल साइंसेज कोलकाता में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर सैदुल इस्लाम का मानना है कि बीजेपी को बंगाल में सत्ता पाना इतना आसान नहीं है. इस्लाम कहते हैं “बंगाल में बीजेपी की बड़ी कमजोरी ये है कि अन्य राज्यों की तरह यहां उसके पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसके नाम पर वोट मिले. जो ममता बनर्जी के टक्कर में खड़ा हो सके. राज्य के नेताओं में अंदरूनी खींचतान है. उनकी जनता में स्वीकार्यता उतनी नहीं है जितनी ममता बनर्जी की है.”


इस्लाम के मुताबिक “बीजेपी की सबसे बड़ी खूबी ये है कि वो बंगाल में अनटेस्टेड पार्टी है. इन दिनों लेफ्ट और कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी का बढ़ रहा है. पिछले एक साल से बीजेपी बंगाल को लेकर ज्यादा संजीदा है. आक्रामक तरीके से काम कर रही है. इसीलिए ज्यादातर उप चुनावों में वो दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. पंचायत चुनाव में भी उसने दूसरे नंबर की जगह बनाई है. पार्टी को यहां विस्तार की संभावना दिख रही है इसीलिए उसने ताकत झोंकी हुई है.”


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