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चीन की हर नई चाल का जवाब देने के लिए अब हिंदुस्तान की फौज कुछ ही घंटों के अंदर चीन की सरहद तक पहुंच जाएगी. जिन इलाकों में बर्फबारी और हिमस्खलन की वजह से जल्दी पहुंचना मुमकिन नहीं था, वहां अब जमीन के नीचे-नीचे जाने की तैयारी चल रही है. इस खास मिशन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए हिंदुस्तान 17 सुरंगों का जाल बिछाने जा रहा है. इनमें से एक सुरंग रोहतांग टनल है, जिसे बनाकर भारत ने दुनिया के सामने अपने हुनर का लोहा मनवा दिया है.रोहतांग टनल समुद्र तल से दस हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर बनी 8.8 किलोमीटर लंबी सुरंग है. यह सुरंग हिमालय की गोद में बहने वाले एक प्राकृतिक नाले के नीचे से गुजरती है. इस सुरंग के नीचे एक इमरजेंसी सुरंग भी तैयार की गई है. इस सुरंग की मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये अपने ऊपर कई टनों का बोझ संभाले हुए है और अभी इस रास्ते पर ये पहली सुरंग है.
मनाली से लेह के बीच चार दर्रे आते हैं. इन्हीं दर्रों के नीचे तीन सुरंग बनाने की तैयारी जारी है. इनमें से रोहतांग दर्रे के नीचे रोहतांग सुरंग लगभग तैयार है. इसके बाद बारलाचाला पास, ला चुंगला पास और थांगला पास में भी सुरंग तैयार होनी है. इन सभी सुरंगों के बनने के बाद मनाली से लेह के बीच 480 किलोमीटर की दूरी कुछ ही घंटों में तय हो जाएगी. इसका मतलब ये है कि अगर कभी चीन ने हिंदुस्तान को आंखें दिखाने की कोशिश की तो उसे मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हमारी फौज की भारी तादाद चीन की सरहद तक कुछ ही घंटों में पहुंच जाएगी.
रोहतांग सुरंग के सफर के दौरान न्यूज18 की टीम उस जगह पर भी पहुंची, जिसे दुरुस्त करने में चार साल से लंबा वक्त लग गया, लेकिन अभी तक कामयाबी नहीं मिली है. इस टनल के ऊपर से बहने वाला सैरी नाला लगातार रिस रहा है. इस पूरे टनल में 600 मीटर के करीब इस सीरी नाले का असर मौजूद है. लंबी मशक्कत के बाद इसे काफी हद तक काबू कर लिया गया है, लेकिन रिसाव पूरी तरह बंद करने की चुनौती बाकी है.रोहतांग सुरंग देश की पहली ऐसी सुरंग है, जिसमें इमरजेंसी एक्जिट टनल के बगल से नहीं बल्कि नीचे से गुजरती है. मुश्किल हालात में अगर ऊपर वाली टनल बंद हो गई, तो नीचे की सुरंग से बाहर निकला जा सकता है. इसके लिए हर पांच सौ मीटर पर एक एस्केप रूट है.
चार हजार करोड़ के इस प्रोजेक्ट पर अब तक दो हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके है. सुरंग में हर 250 मीटर पर CCTV कैमरे से निगरानी की जाएगी. हर एक किलोमीटर पर ‘पार्किंग’ की जगह बनाई गई है. हवा की गुणवत्ता जांचने के लिए जगह-जगह मशीनें लगाई जाएंगी. जो सुरंग में ऑक्सीजन की मात्रा की जांच करती रहेंगी.
रोहतांग दर्रे को ऊपर से पार करते वक्त 40 ऐसी जगहें आती हैं, जहां हिमस्खलन की संभावना सबसे ज्यादा होती है. अब तक हमारे जवान माइनस 15 डिग्री के तापमान में जान हथेली पर रखकर रोहतांग पास से गुजरते थे लेकिन अब पहाड़ का सीना चीरकर सैनिकों की आवाजाही आसान कर दी गई है. रोहतांग दर्रे के 78 किलोमीटर का रास्ता इस सुरंग के बनने से 46 किलोमीटर कम हो जाएगा. उम्मीद की जा रही है कि 2020 तक ये सुरंग पूरी तरह तैयार हो जाएगी.
साल के पांच महीने जब इन इलाकों में बर्फबारी के चलते यातायात पूरी तरह से बंद हो जाता है, ऐसे में सीमा पर सरहदों की सुरक्षा करने वाले जवानों तक हथियार, गोलीबारूद और रसद सड़क के रास्ते पहुँचा पाना मुश्किल हो जाता है. जंग की तैयारियों के लिहाज से भी सरहदी इलाकों तक पहुंच आसान बनाना जरूरी है और रोहतांग सुरंग के जरिए भारत ने चीन को जवाब देने की शुरुआत कर दी है.
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