Sunday, 29 April 2018

हिंदू धर्म से लिंगायत समुदाय के अलग होने की ये है असल वजह?


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कर्नाटक की राजनीति जिस धुरी पर नाच रही है, उसका नाम है लिंगायत समुदाय. बीजेपी हिन्दुत्व एकता के नाम पर लिंगायत वोट लेने की जुगत में है. तो वहीं कांग्रेस ने लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग अल्पसंख्यक दर्जा देकर उनकी एक सदी से ज्यादा पुरानी मांग पूरी कर दी है.कर्नाटक चुनाव की राजनीति जैसे जैसे गरम हो रही है, वैसे-वैसे देश की आबोहवा में ये सवाल उठने लगे हैं. न्यूज़ 18 इंडिया की टीम इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए कर्नाटक पहुंची. सवाल ये कि कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय को क्या कांग्रेस अपने फायदे के लिए हिन्दू धर्म से अलग अल्पसंख्यक का दर्जा दे रही है.


कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के 400 मठ हैं.कर्नाटक में 14 प्रतिशत आबादी लिंगायत समुदाय की है.100 सीटों पर लिंगायत फ़ैक्टर का प्रभाव माना जाता है.


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लिंगायात समुदाय के इतने बड़े वोट बैंक को साथ लाने के लिए ही सिद्धारमैया सरकार ने उसे अल्पसंख्यक का दर्जा देने का दांव चला है. कांग्रेस को लगता है कि उसके इस दांव से एक मुश्त लिंगायत वोट उसे मिलेंगे. कर्नाटक में लिंगायत समुदाय की सियासी ताकत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि लिंगायतों के झुकाव से ही 1983 में जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े को सीएम की कुर्सी मिली.2008 में जब लिंगायतों ने येदियुरप्पा के सिर पर हाथ रखा, तो बीजेपी के लिए दक्षिण के द्वार खुल गए. 2013 में बीजेपी से लिंगायत क्या छिटके सत्ता ही चली गई. इसीलिए हर पार्टी चाहती है कि लिंगायतों का हाथ उनके साथ रहे.कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय की मांग को पूरा तो कर दिया है, लेकिन सवाल ये भी है कि लिंगायत हिन्दू धर्म से अलग क्यों होना चाहते हैं? दरअसल लिंगायत समाज कर्नाटक में बहुत बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान चलाता है और वो इन संस्थानों में सरकारी दखल नहीं चाहता.


लिंगायत समुदाय चाहता है कि इन तमाम संस्थानों से जुड़ी अर्थव्यवस्था और मैनेजमेंट सिर्फ उनके हाथ में रहे. इसीलिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग की जा रही है, ताकि इन संस्थानों से सबसे ज्यादा लिंगायत समुदाय के लोगों को फायदा पहुंच सके.


लिंगायत समुदाय की तरफ अल्पसंख्यक दर्जे की मांग का मुख्य मकसद क्या शिक्षण संस्थानों के लिए ऑटोनमी हासिल करना ही है?
दरअसल लिंगायत समुदाय चाहता है कि वो अल्पसंख्यकों मिलने वाले विशेषाधिकार का फायदा उठा सके. संविधान का अनुच्छेद 15(5) अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को विशेषाधिकार देता है. अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा के अधिकार के नियम सहित कई और तरह की छूट मिली हुई हैं. ऐसी ही छूट का फयादा उठाना लिंगायत समुदाय चाहता है.


अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने पर लिंगायत शिक्षण संस्थानों में एडमिशन पर आरक्षण ख़त्म हो जाएगा. लिंगायत समुदाय के शिक्षण संस्थान शिक्षा के अधिकार नियम से मुक्त हो जाएंगे. लिंगायत समुदाय को छूट होगी कि वो अपनी मर्ज़ी से अध्यापक तैनात कर सके. कोटे की सीट या फिर नौकरी में आरक्षण देने जैसे नियम लिंगायत शिक्षण संस्थान पर लागू नहीं होंगे.


लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद शिक्षण संस्थानों में किस तरह की स्वायत्ता और नियमों में छूट मिल जाएगी?
फिलहाल कर्नाटक में लिंगायतों के लेकर राजनीति गरम है. ये तो चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि लिंगायत किसके साथ जाते हैं लेकिन लिंगायत समुदाय के अल्पसंख्यक दर्जा मांगने की सबसे बड़ी वज़ह यही है.


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