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गुजरात के उना में रविवार को करीब 450 दलितों ने रविवार को धर्म परिवर्तन कर लिया. अपने ऊपर हो रहे कथित अत्याचार के चलते मोटा समाधियाला गांव के करीब 50 दलित परिवारों के अलावा गुजरात के अन्य क्षेत्रों से आए दलितों ने यहां एक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें हिंदू नहीं माना जाता, मंदिरों में नहीं घुसने दिया जाता, इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया.समारोह के आयोजक ने दावा किया कि इसमें 450 दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इस समारोह में 1000 से अधिक दलितों ने हिस्सा लिया.
इस मामले के पीड़ितों बालू भाई सरवैया और उनके बेटों रमेश और वश्राम के अलावा उनकी पत्नी कंवर सरवैया ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. बालू भाई के भतीजे अशोक सरवैया और उनके एक अन्य रिश्तेदार बेचर सरवैया ने बुद्ध पूर्णिमा के दिन हिन्दू धर्म छोड़ दिया था. ये दोनों भी उन सात लोगों में शामिल थे , जिनकी खुद को गोरक्षक बताने वालों ने कथित तौर पर पिटाई की थी.
रमेश ने कहा कि हिन्दुओं द्वारा उनकी जाति को लेकर किये गए भेदभाव के कारण उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. उसने कहा, ‘‘हिन्दू गोरक्षकों ने हमें मुस्लिम कहा था. हिन्दुओं के भेदभाव से हमें पीड़ा होती है और इस वजह से हमने धर्म परिवर्तन का फैसला किया. यहां तक कि राज्य सरकार ने भी हमारे खिलाफ भेदभाव किया क्योंकि उत्पीड़न की घटना के बाद जो वादे हमसे किये गए थे, वे पूरे नहीं हुए. ’’रमेश ने कहा, ‘‘हमें मंदिरों में प्रवेश करने से रोका जाता है. हिन्दू हमारे खिलाफ भेदभाव करते हैं और हम जहां भी काम करते हैं , वहां हमें अपने बर्तन लेकर जाना पड़ता है. उना मामले में हमें अब तक न्याय नहीं मिला है और हमारे धर्म परिवर्तन के पीछे कहीं – न – कहीं यह भी एक कारण है.
A series of Dalits converted to Buddhism in #Gujarat‘s Una, said, we are not deliberate Hindu and we are not even authorised to enter temples, so we have converted to Buddhism. pic.twitter.com/zk3e30dHPK
— ANI (@ANI) April 29, 2018
सूत्रों के मुताबिक, गांव में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए धर्मांतरण वाली जगह पर भारी संख्या में पुलिस बल मौजूद था. धर्म परिवर्तन के लिए तीन बौद्ध भिक्षुओं को बुलाया गया था. इस समारोह में शामिल होने के लिए कोई भी दलित नेता मौजूद नहीं था.
बता दें कि जुलाई 2016 में कथित तौर पर कुछ गौरक्षकों ने उना में दलितों को एक मरी हुई गाय का खाल उतारने के कारण उन्हें अधनंगा करके पीटा और पूरे शहर में घुमाया था. उसके बाद से ही इस मामले ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया था. इस घटना के विरोध में पूरे भारत में दलित सड़कों पर उतर आए थे. हालांकि बाद हुई जांच से पता चला कि गाय को दलितों ने नहीं मारा था, बल्कि उसकी मौत किसी जंगली जानवर के हमले की वजह से हुई थी.
पीड़ित परिवार का कहना है कि शिकायत करने पर सरकार से हर तरह के मदद करने का आश्वासन दिया गया था. दलितों के प्रति होने वाले अत्याचार के मामलों के जल्द निपटारे के लिए एक अलग अदालत बनाने की घोषणा भी की गई थी. लेकिन इस मामले में कोई भी कार्रवाई नहीं की गई. पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें किसी तरह की कोई राहत सरकार से नहीं मिली. सारे अभियुक्त ज़मानत पर आजाद घूम रहे हैं, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म का त्याग कर दिया.
(भाषा इनपुट के साथ)
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