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कमलनाथ के नजदीकी उन्हें मास्टर ऑफ रियल पॉलिटिक कहते हैं यानी जोड़-तोड़ में माहिर राजनेता. यूपीए-2 की सरकार में संसदीय कार्यमंत्री रहते हुए कमलनाथ का जो फ्लोर मैनेजमेंट था उसकी मिसालें आज तक दी जाती हैं. अपने विरोधियों को साधना उनके बाएं हाथ का खेल है. अपने दरवाजे पर आए व्यक्ति को खाली हाथ नहीं जाने देना उनकी शख्सियत में शुमार है. लेकिन अपने 40 साल के राजनीतिक करियर में वो पहली बार दिल्ली छोड़कर मध्यप्रदेश संगठन में वापसी कर रहे हैं. कमलनाथ के लिए यह राह इतनी आसान नहीं है.संगठन में जान फूंकनी होगी
15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हो चुका है. संगठन की जान कहे जाने वाले दर्जनों प्रकोष्ठ बेजान पड़े हुए हैं. सेवादल, यूथ कांग्रेस, एनएसयूआई, महिला कांग्रेस जैसे सहयोगी दल प्रभावहीन हो चुके हैं. चुनाव में बूथ मैनेजमेंट तो दूर बूथ पर बैठने वाले कार्यकर्ता की फौज गायब हो चुकी है. चुनाव से जीत रहे कांग्रेस के विधायक, सांसद खुलकर स्वीकार करते हैं कि वे संगठन के दम पर नहीं अपनी निजी टीम के भरोसे चुनाव लड़ रहे हैं.
भाजपा पूरी तैयारी मेंवहीं भाजपा में तस्वीर दूसरी है. पूरा सत्ता तंत्र, संगठन पूरी तरह गतिशील है. सड़क से लेकर बूथ तक कार्यकर्ताओं की सेना लगी हुई है. जहां भाजपा कमजोर है वहां संघ से जुड़े दूसर संगठन मैदान संभाल चुके हैं. ऐसा नजर आता है कि भाजपा जहां चुनाव की आखिरी तैयारियों में लगी हुई है वहीं कांग्रेस अपनी शुरूआत करने जा रही है.
नियुक्तियां परेशानी का सबब
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ के पास सिर्फ डेढ़ महीने का समय बचा है. इस दौरान उन्हें प्रदेश संगठन खड़ा करना है. जिला और शहर संगठन में नई नियुक्तियां करनी है और नीचे तक संगठन की नींव को मजबूत करना है, खास तौर पर अल्पसंख्यक, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग के प्रकोष्ठ और महिलाओं के संगठन को. 15 मई के कर्नाटक चुनाव परिणाम भी रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण होंगे. वे किस तरह निर्विवाद और सभी गुटों से तालमेल कर संगठन में नियुक्तियां करते हैं यह देखना होगा.
पावर के इर्द-गिर्द
कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री कहते हैं कि कमलनाथ की राजनीतिक शैली अभी तक दिल्ली में पावर के इर्द-गिर्द चेंबर पॉलिटिक्स की रही है. स्वयं के लोकसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा के अलावा पूरे प्रदेश में उन्होंने बहुत ही सीमित दौरे किए हैं. 71 साल की उम्र में क्या वे प्रदेश के दौरे कर पाएंगे? संगठन सक्रिय करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को जरूरी होगा कि वे संभागीय, जिले और विधानसभा स्तर पर दौरे करें.
गुटबाजी पर लगाम
माना जा रहा है कि गांधी परिवार के करीबी होने के कारण कमलनाथ के सामने कांग्रेस की गुटबाजी नहीं चल पाएगी. दिग्विजय, सिंधिया, पचौरी, अरूण यादव, अजयसिंह और स्वयं कमलनाथ के समर्थकों में बंटी कांग्रेस को वे किस तरह एकजुट कर सक्रिय कर पाएंगे.
माना जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई बैठकों में यह तय किया गया है कि कमलनाथ को पूरा सहयोग दिग्विजयसिंह का रहेगा. वे जल्द ही नर्मदा परिक्रमा से बाहर रहे 120 विधानसभा क्षेत्रों से इसकी शुरूआत करेंगे. लेकिन क्या यह यात्रा दिग्विजयसिंह की निजी यात्रा होगी. या कांग्रेस की यात्रा होगी. इसका स्वरूप प्रदेश संगठन को तैयार करना है. यात्रा संयोजक कौन होगा ? यह पूरे कांग्रेस की सर्वमान्य यात्रा किस तरह होगी इसका रास्ता भी ढूंढना होगा. हालांकि दिग्विजयसिंह के करीबी नेता पूर्व मंत्री महेश जोशी एवं रामेश्वर नीखरा इसका रोडमेप बनाने में जुट गए हैं. लेकिन चुनौती सिंधिया समेत अन्य खेमों को इसमें जोड़ने की होगी. उल्लेखनीय है कि नर्मदा परिक्रमा में सिंधिया खेमा दूर था.
घर बैठे नेताओं को काम पर लगाना
एक पूर्व सांसद कहते हैं कि पिछले तीन चुनावों में पूरी कांग्रेस का एक बिखरी हुई थी. सुरेश पचौरी अध्यक्ष बने तो दूसरे गुट घर बैठ गए. भूरिया सिंधिया मैदान में आए तो दूसरे अन्य गुटों ने औपचारिकता निभाई. ऐसे कई नेता है जो पूछ परख नहीं होने से घर बैठ गए हैं. उन्हें जिम्मेदारी सौंपना और काम देना अब नए प्रदेश अध्यक्ष पर है.
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