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भारतीय रेल में मानवरहित क्रॉसिंग पर तीन तरह के फाटक लगाए जाते हैं. इसके अलावा ROB यानि रोड ओवर ब्रिज़ और RUB यानि रोड अंडर ब्रिज़ बनाकर मानवरहित क्रॉसिंग को ख़त्म किया जाता है. ROB या RUB बड़ी योजना होती है और इसे बनाने के लिए बड़े स्तर पर स्थानीय सरकार, प्रशासन हर किसी की मंज़ूरी और सहुलियत देखी जाती है.रेल फाटकों की बात करें तो इसमें सबसे कम ख़र्च के साथ मैकेनिकल फाटक लगाए जाते हैं, जिन्हें ट्रेन आने से पहले कोई व्यक्ति ख़ुद जाकर बंद करता है और ट्रेन के गुज़र जाने के बाद खोलता है. इस फाटक को बनाने में 15 लाख रुपये का खर्च आता है.
इसमें इलेक्ट्रिकल फाटक भी लगाए जाते हैं जो मशीन से चलते हैं यानि इसे बंद करने और खोलने का काम मशीन से होता है जिसके लिए एक ऑपरेटर तैनात होता है. इस तरह से एक फाटक पर 27 लाख रुपये का खर्च आता है.
रेल फाटकों में सबसे खर्चिला इंटर-लॉकिंग फाटक होता है, जो मशीन से चलता है साथ ही इसमें सिग्नल भी लगे होते हैं. इस पर लगी बत्तियों से ट्रेन के आने और जाने की सूचना भी मिलती है. रेलवे फाटक को बनाने का काम भले ही आसान दिखता हो लेकिन इसे बनाने में 4 महीने तक का वक़्त लगता है.सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का ख़ुलासा किया है कि रेलवे में ज़रूरी प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी मिलने में कई साल का समय लग जाता है. रेलवे फाटकों को बनाने के खर्च के बाद बड़ा खर्च होता है यहां किसी स्टाफ की तैनाती. फाटकों पर आमतौर पर हर रोज़ शिफ़्ट के हिसाब से 2 से 3 लोगों को नियुक्त किया जाता है. ऐसे में इनके वेतन पर भी रेलवे को बड़ा खर्च करना पड़ता है. अगर इन फाटको पर ठेके पर भी लोग रखे जाएं तो उन्हें स्थानीय सरकार की नीतियों के मुताबिक न्यूनतम मज़दूरी देनी होती है.
रेल लाइनों पर मौजूदा समय में 7 हज़ार से ज़्यादा मानवरहित क्रॉसिंग हैं. हालांकि रेलवे को इनमें से 5459 जगहों से मानवरहित क्रॉसिंग हटानी है. सबसे ज्यादा मानवरहित क्रॉसिंग ब्रॉड गेज की लाइन पर है जिसकी संख्या 3479 है. जबकि मीटर गेज पर 1135 और नैरो गेज पर 1178 मानरहित क्रॉसिंग को ख़त्म किया जाना है.
रेलवे ने इन क्रॉसिंग्स को भी कई भागों में बांट रखा है. जिन रूट्स पर ट्रेनों की रफ़्तार 130 किलोमीटर से ज़्यादा होती है उन्हें A कैटेगरी, जिनपर ट्रेनों की रफ़्तार 130 से कम होती है उन्हें B कैटेगरी, मुंबई जैसे सबअर्बन ट्रेनों के रूट को C कैटेगरी और जिन रूट्स पर दिनभर में महज़ 2-4 ट्रेनें गुज़रती हैं उन्हें D और E कैटेगरी में बांटा गया है.
रेलवे के पास ऐसे कामों के लिए पैसों की कमी नहीं है. एक और जहां ममता बनर्जी के समय रेल बजट 32 हज़ार करोड़ का हुआ करता था इस साल के बजट में रेलवे के लिए 1 लाख 48 हज़ार करोड़ का प्रावधान है. लेकिन रेलवे के सामने परेशानी है एक साथ कई मोर्चे खोल देना. रेलवे जहां एक तरफ ट्रैक मेंटेनेंस जैसे बहुत ही ज़रूरी काम पर ज़ोर दे रहा है वहीं स्टेशनों से लेकर ट्रेनों तक के रंग रोगन की वजह रेलवे का ध्यान ज़रूरी कामों से भटकता रहता है.
रेलवे 3 साल से अपने 600 स्टेशनों को अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं से लैस बनाने की कोशिश में लगा हुआ है, लेकिन अब तक रेलवे तीन ऐसे स्टेशन भी नहीं बना पाया है. दूसरी ओर रेलवे अब 40000 पुराने यात्री डिब्बों के साथ सभी वैगन और कंटेनर का रंग-रूप संवारने में लगा है. ऐसी योजनाओं पर ध्यान देने से ज़ाहिर है ट्रेनों का समय पर परिचालन, मुसाफ़िरों को कन्फ़र्म बर्थ मिलना या सुरक्षा जैसे मुद्दों से भटकाव होगा.
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